Friday, April 20, 2018

हमारे समाज का पानी मर गया है


मुहल्ले में सड़क किनारे सुबह-शाम पानी का फव्वारा-सा फूटता देख कर हमने अपने एक पड़ोसी से कहा- शायद यह आपका कनेक्शन लीक कर रहा है. तपाक से उनका जवाब आया- हमने तो बोरिंग करवा रखी है. पब्लिक कनेक्शन जुड़वाया ही नहीं. वे इस तरह हंसे जैसे कि हम पर दया कर रहे हों- जल संस्थान के कनेक्शन पर निर्भर बेचारा! खैर, हमने जल संस्थान में शिकायत दर्ज कराई और पानी का वह रिसाव बंद करा दिया गया.

कॉलोनी के ज्यादातर घरों में डीप बोरिंग है. राजधानी में बिजली की बहुत समस्या नहीं होती. चौबीस घण्टे पानी की बहार. जब चाहिए बटन दबाइए, गाड़ी धोइए और सड़क तर कीजिए, लेकिन कब तक? जिनकी बोरिंग कुछ साल पुरानी है वे शिकायत करते हैं कि पहले जैसा पानी नहीं आता या बोरिंग बेकार हो चुकी, रि-बोर कराना पड़ेगा.

पिछले दिनों नगर निगम के अधिकारियों के हवाले से एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि लखनऊ के हर दूसरे-तीसरे घर में सब-मर्सिबल पम्प लगे हैं. जल संस्थान के नलकूप अलग हैं, जिन्हें हर कुछ वर्ष में और गहरा करना पड़ता है. नगर निगम ने खुद भी सभासदों या किसी बड़े की सिफारिश पर कई जगह सब-मर्सिबल पम्प लगाये हैं.
पानी का व्यापार करने वालों ने भी जघ-जगह बोरिंग करा रखी हैं. जमीन से पानी का निरंतर दोहन करके वे पानी बेचते हैं. पानी की मांग साल भर बनी रहती है. गर्मियों में बहुत बढ़ जाती है. पानी के बड़े-बड़े जरकिन लेकर सप्लाई पर निकली गाड़ियां शहर में कहीं भी देखी जा सकती हैं. शहर के कई मुहल्ले पानी को तरसते हैं. वे चार-पांच सौ रु महीने पर इन्हीं से पानी खरीदते हैं. बाजारों-मुहल्लों में वैध-अवैध दुकानों में पानी के यही व्यापारी जरकिन सप्लाई करते हैं.

साल में करीब दो हजार रु जल-कर चुकाने वाले हमारे जैसे लोग जल संस्थान की दो टाइम की सप्लाई के भरोसे बैठे पानी का यह अंधाधुंध दोहन आउर अनियंत्रित व्यापार देखते रहते हैं. सब-मर्सिबल वालों को कोई कर नहीं चुकाना पड़ता. किसी सरकारी एजेंसी के पास यह रिकॉर्ड नहीं है कि राजधानी में कितने निजी सब-मर्सिबल लगे हैं और वे जमीन से मुफ्त में कितना पानी खींच रहे हैं. आपके पास पैसे की कमी नहीं है तो बोरिंग करवा लीजिए. कोई पूछने वाला नहीं. न किसी से इजाजत लेनी है, न कोई कर चुकाना है और जब जितना चाहे पानी उड़ाइए.

यह हमारी नगरीय व्यवस्था का सच है. हर साल पानी का संकट बढ़ता जा रहा है. जमीन में पानी का स्तर निरंतर घट रहा है और बारिश का पानी भूमि में जाने के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं. हम बड़े पानी संकट के मुहाने पर खड़े हैं. पैसे वाले सोचते हैं कि वे पैसे के बल पर सब कुछ खरीद सकते हैं. अभी तो खरीद ही रहे हैं. बाद की, अपनी ही अगली पीढ़ियों की किसे चिंता है.

इस बीच खबर आयी कि लोक भवन (मुख्यमंत्री के नये दफ्तर) के पीछे खुदाई में एक पुराना कुआं निकला. कुआं गहरा था तो सुरंग होने की अफवाह उड़ी. सब-मर्सिबल के जमाने में कुओं को सुरंग ही समझा जाएगा! अधिकारियों ने उसे बंद करवा दिया. यह हमारी व्यवस्था की समझ का हाल है. कुएं और तालाब पाट दो और वाटर हार्वेस्टिंग के लिए नालियां खोदो. लखनऊ के तालाब और कुएं ही बचा लिए होते तो न पानी की इतनी किल्लत होती न वाटर हार्वेस्टिंग का ड्रामा करना पड़ता.

अपनी नदियों, तालाबों, कुओं को कंक्रीट से पाट देने वाले समाज का पानी मर ही जाता है.   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 21 अप्रैल, 2018)


Friday, April 13, 2018

जब सुनवाई पोर्टल पर शिकायत का हश्र



‘’आपका आवेदन पत्र संख्या 40015718017892, जो अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को सम्बोधित है, पोर्टल पर दर्ज हो गया है.” अपने मोबाइल पर यह संदेश देख कर हम बहुत खुश हुए. यह टेक्नॉलॉजी का जमाना है. प्रदेश सरकार ने भी अपना पोर्टल बनाया है.  उस पर लॉग-इन कीजिए और शिकायत दर्ज करा दीजिए. अधिकारियों-मंत्रियों तक भाग-दौड़ की जरूरत नहीं.

सुबह 10.12 बजे शिकायत दर्ज हुई थी और रात 10.14 पर संदेश प्राप्त हुआ कि आपका आवेदन पत्र सचिव, स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन को अग्रिम कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दिया गया है. हमें सरकार की तेजी पर दांतों तले अंगुली दबानी पड़ी. किस्सा यह कि हमने सन 2007 में एक निजी बिल्डर से दो कमरे का एक फ्लैट खरीदा. बैंक से ऋण लेकर बिल्डर को पूरा भुगतान कर दिया. दो-ढाई साल में फ्लैट देने का वादा था. समय पर न दे पाने की स्थिति में दण्ड स्वरूप कुछ भुगतान का वादा भी था.

बहुत दौड़-भाग करने पर करीब नौ साल के बाद  2016 में रोहतास प्लूमेरिया में फ्लैट का कब्जा मिला. सुविधाविहीन आधे-अधूरे परिसर में भी कब्जा मिल जाने पर खुशी हुई थी. पूर्ण अग्रिम भुगतान के बावजूद आज तक न पार्किंग मिली, न क्लब बना, न समुचित सफाई, सुरक्षा की व्यवस्था, आदि-आदि. उससे बड़ी समस्या यह कि रोहतास बिल्डर फ्लैट की रजिस्ट्री कराने को राजी नहीं. हजार के आस-पास आवंटी परेशान. धरना-प्रदर्शन, लविप्रा, डीएम, आदि को ज्ञापन का बिल्डर पर कोई असर नहीं. फिर सबने मिलकर एफआईआर करा दी.

जनसुनवाई पोर्टल का ढोल बज रहा था. सबने पोर्टल पर अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराईं और खुश हुए कि अब तो कुछ नतीजा निकलेगा. बीते सोमवार को मोबाइल सन्देश प्राप्त हुआ कि “संदर्भ संख्या 40015718017892 का निस्तारण कर दिया गया है. निस्तारण आख्या जनसुनवाई पोर्टल/मोबाईल ऐप के माध्यम से देखी जा सकती है.” हमने अत्यंत प्रसन्नता से पोर्टल खोला. आख्या में लिखा है –“प्रश्नगत प्रकरण का परीक्षण किया गया. स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग को किसी प्रकार की दण्डात्मक कार्यवाही के लिए विलेख की आवश्यकता होती है. बिना किसी लेखपत्र के किसी प्रकार की स्टाम्प वसूली या दण्डात्मक कार्यवाही किया जाना सम्भव नहीं है.....”

सरकारी हिंदी समझने में पाठकों का मानसिक श्रम बचाने के लिए हम आगे के संदेश का आशय बता दें. लिखा है कि अगर बिल्डर जानबूझ कर रजिस्ट्री नहीं कर रहा है या इसके लिए अनुचित धन मांग रहा है तो उसके खिलाफ एफआईआर करानी चाहिए और कानूनी सलाह लेकर अदालत में मुकदमा दर्ज कराना ठीक रहेगा. हरेक शिकायतकर्ता को यही जवाब भेजा गया है.

हमारी  उम्मीदों पर पानी फिरना ही था. पोर्टल पर जो दस्तावेज मांगे थे वे हमने अपलोड कर दिये थे. और क्या विलेखचाहिए, यह बताते तो वह भी उपलब्ध करा देते. एफआईआर पहले ही दर्ज कराई जा चुकी थी. कुछ आवण्टी अदालत की शरण भी जा चुके हैं. सामूहिक रूप से अदालत जाने पर भी एसोसियेशन विचार कर रही है. जनसुनवाई पोर्टल ने हमें क्या नया बताया? हमारी क्या मदद की? हमारी समस्या का क्या समाधान किया?

लाल फीते वाली फाइलें हों या टेक्नॉलजी का नया जमाना, सरकारी तंत्र की मानसिकता नहीं बदलती. उसे जनता की समस्याओं के वास्तविक समाधान से कोई मतलब नहीं. उसे बस शिकायती पत्र का निस्तारण कर देना होता है. कई बिल्डर इसी तरह आवण्टियों और सरकार को ठग रहे हैं. रजिस्ट्री की पूरी रकम सरकारी खजाने में जानी है. तब भी सरकार रजिस्ट्री न कराने वाले बिल्डरों पर कार्रवाई नहीं कर रही.  

जनसुनवाई पोर्टल पर निस्तारित शिकायतोंकी बढ़ती संख्या देख कर सरकारी तंत्र अपने गाल बजा रहा होगा. जनता समस्या के जस का तस रहने पर माथा पीटने के अलावा क्या कर सकती है?

(सिटी तमाशा, 14 अप्रैल, 2018)


Friday, April 06, 2018

दलित-राजनीति और दलित की बारात



इक्कीसवीं सदी का यह 19वां वर्ष है. दलित हितों के लिए लड़ने का दावा और वादा करने के लिए सभी राजनैतिक दलों में होड़ मची है. आम्बेडकर जयंती करीब है. सभी राजनैतिक पार्टियां उसे धूमधाम से मनाने की तैयारियां कर रही हैं. एससी-एसटी एक्ट पर मारामारी मची है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद रोज पहले कहा कि सरकार आम्बेडकर के दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ रही है. मुख्यमंत्री योगी कह रहे हैं कि उनकी सरकार दलितों की रक्षा के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगी.

इस सब के बीच एक दलित युवक अपनी बारात गांव के बीच से ले जाने के लिए अदालत से लेकर आला पुलिस अधिकारियों तक गुहार लगा रहा है. वह धूमधाम से बारात ले जाना चाहता है. उसकी मंगेतर चाहती है कि उसका दूल्हा घोड़ी पर चढ़ कर उसे ब्याहने आये. गांव के सवर्णो ने चेतावनी दी है कि वह उनके घरों के सामने से बारात नहीं ले जा सकता. चाहे तो लड़की के घर से दूर एक छोटे मैदान में शादी कर सकता है. लड़के-लड़की दोनों का कहना है कि वह मैदान बहुत छोटा है. वहां धूमधाम से ब्याह नहीं हो सकता.  

मामला कासगंज जिले के निजामपुर गांव का है. हाथरस के जाटव युवक संजय कुमार की शादी इस गांव की शीतल से 20 अप्रैल को होनी तय हुई है. संजय कानून का विद्यार्थी है. शीतल के गांव वालों की आपत्ति के बाद संजय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की कि उसे बारात निकालने की इजाजत दी जाए, उसकी सुरक्षा की जाए. अदालत ने कहा कि वह ऐसा आदेश नहीं दे सकती. संजय को पुलिस प्रशासन के पास जाना चाहिए.

पुलिस ने उससे कहा कि गांव की कुछ परम्पराएं होती हैं. उन्हें नहीं तोड़ना चाहिए. उससे कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है. चूंकि मामला अदालत तक जा चुका था इसलिए कासगंज पुलिस ने संजय को बारात ले जाने के लिए गांव के बाहर-बाहर का रास्ता सुझाया, जो करीब एक किमी और लम्बा है.

लड़के का कहना है कि वह गांव की सीमा से लड़की के घर तक बारात ले जाएगा. उसका मासूम-सा सवाल है कि अगर सवर्ण हमारे लोगों के घरों के सामने से बारात ले जा सकते हैं तो हम उनके घरों के सामने से क्यों नहीं? न गांव वाले राजी हैं, न पुलिस उन्हें राजी करने का प्रयास कर रही है. पुलिस संजय के सामने पिछले कुछ उदाहरण रख रही है जिनमें दलितों की बाहर से आई बारातों ने गांव की परम्परानहीं तोड़ी थी, यानी बारात सवर्णों के घर के सामने से नहीं ले गये थे.

इसे लिखते वक्त यह पता चला है कि कासगंज के डी एम और एसएसपी ने लड़की के घर वालों से कहा है कि आपकी बेटी शीतलअवयस्कहै.उनके पास उस स्कूल के प्रधानाचार्य का हस्तलिखित पत्र है, जहां लड‌की बचपन में पढ़ती थी. उसके अनुसार शीतल 18 साल से दो महीने छोटी है. अब अवयस्क लड़की की शादी होने देकर प्रशासन कानून का उल्लंघन कैसे होने दे सकता है. कानून-व्यवस्था और गांव की परम्पराबनाये रखने के लिए यह शानदार उपाय निकल आया. घर वाले इसे अड़ंगा लगाने का तरीका बता रहे हैं.

बीस अप्रैल को क्या होगा मालूम नहीं लेकिन हम पाठकों से आग्रह करेंगे कि वे पहले पैराग्राफ को एक बार फिर पढ़ें, अपने समाज, राजनीति और प्रशासन के हालात के बारे में थोड़ा विचार करें.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 7 अपरिल 2018

Thursday, April 05, 2018

एससी-एसटी एक्ट को मायावती ने स्वयं भी नरम किया था


सन 1989 के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून के संदर्भ में, जिसे संक्षेप में एसटी-एसटी एक्ट के नाम से जाना जाता है, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नये दिशा-निर्देश जारी किये तो उसके विरोध में हुए उग्र दलित आंदोलन का मायावती ने फौरन समर्थन किया. उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अदालत के माध्यम से इस कानून को कमजोर करके दलितों की हकमारी कर रही है. यह भी कि दलितों को एससी-एसटी कानून की सुरक्षा बाब साहेब अम्बेडकर के प्रयासों और लम्बे आंदोलन के बाद मिली है. मायावती ने यह चेतावनी भी दी कि एनडीए सरकार की यह साजिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

कानून के कतिपय प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के संदर्भ में यह बयान देते हुए शायद मायावती को यह ध्यान नहीं रहा कि आज से 11 साल पहले स्वयं उन्होंने इस कानून के कार्यान्वयन के बारे में दो आदेश जारी किये थे. ये आदेश भी लगभग ऐसे ही थे जैसे बीती 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने जारी किये हैं.

आज सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को एस-एसटी एक्ट को कमजोर करने वाला मानने वाली मायावती को सन 2007 में अपने फैसले इस एक्ट को नरन करने वाले नहीं लगे थे. राजनीति भी नेताओं से कैसे-कैसे विरोधाभासी काम कराती है.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च के निर्देशों में यह कहा है कि इस एक्ट का दुरुपयोग भी होता है. इसलिए ऐसे उपाय जरूरी हैं कि निर्दोष व्यक्ति प्रताड़ित नहीं किये जाएं. 20 मई 2007 को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार ने भी अपने आदेश में यही कहा था कि एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में यही कहा है कि चूंकि यह एक्ट बहुत सख्त है इसलिए निर्दोष को इसमें फंसाये जाने से बचाना जरूरी है.

तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के निर्देश पर तत्कालीन मुख्य सचिव शम्भू नाथ ने 20 मई 2007 को एससी-एसटी एक्ट के बारे में पहला आदेश जारी किया था. उस लम्बे आदेश के  एक बिंदु का सारांश यह था कि (दलितों-आदिवासियों की) हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराध ही एससी-एसटी एक्ट में दर्ज किये जाएं. इससे कमतर अपराध इस एक्ट की बजाय भारतीय दण्ड संहिता यानी आई पी सी के अंतर्गत लिखे जाएं. यह फैसला उन्होंने सत्ता में आने के चंद रोज बाद ही क्या था.

अगर यह यह एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करना था तो उसे और भी कमजोर बनाने वाला अगला आदेश मायावती ने करीब पांच महीने बाद, 29 अक्टूबर 2007 को जारी करवाया. तब के मुख्य सचिव प्रशांत कुमार ने पुलिस महानिदेशक तथा सभी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नाम जारी आदेश में कहा था कि यदि किसी (दलित) ने निर्दोष व्यक्ति को एससी-एसटी में झूठे आरोप में फंसाया है तो शिकायतकर्ता के खिलाफ धारा 182 में रिपोर्ट दर्ज की जाए.

गैर-बसपा दलित नेताओं ने उस वक्त इन आदेशों के लिए मायावती सरकार की निंदा की थी. इसे एससी-एसटी एक्ट को निष्प्रभावी बनाने वाला बताया था. यह भी आरोप लगाया था कि मायावती सरकार सवर्णों के इशारे पर नाच रही है.

मायावती तब सवर्ण नेताओं के इशारे पर चल रही थीं या नहीं, लेकिन 2007 का चुनाव उन्होंने अपनी उस कथित सोशल इंजीनयरिंगके कारण जीता था जिसमें सवर्णों, विशेष रूप से ब्राह्मणों को बहुत महत्त्व दिया गया था. माना यही गया था कि मायावती की इसी सोशल इंजीनियरिंग के कारण बसपा को विधान सभा में पूर्ण बहुमत मिला. उन्होंने दलितों से ज्यादा टिकट सवर्णों को दिये थे, जिनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की थी. मायावती के मंत्रिमण्डल में तब ब्राह्मण-ठाकुर अच्छी संख्या में थे. निगमों में भी कई सवर्णों को राज्यमंत्री का दर्जा देकर महत्त्व दिया गया.

यह वही समय था जब दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने मायावती को आगाह किया था कि वे बहुजन आंदोलन के रास्ते से भटक रही हैं. इसी दौर में कांशीराम के समय से बसपा को मजबूत करने में लगे कई दलित नेताओं का मायावती से मोहभंग शुरू हुआ. उन्होंने सत्ता के लाभ सवर्णों को पहुंचाने पर भीतर-भीतर नाराजगी व्यकत की थी. कालानतर में उनमें से कई जमीनी दलित नेता बसपा छोड़ गये या मायावती ही ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. 2012 के विधान सभा चुनाव में मायाबती को पराजय का मुंह देखना पड़ा.

सन 2007 की चुनावी सफलता से पहले मायावती एससी-एसटी एक्ट के बारे में बहुत सख्त थीं. उसे किसी भी तरह कन्मजोर करना उन्हें मंजूर न था. 1995 में राज्य अतिथि गृह काण्ड के बाद सपा से उनका गठबंधन टूटा और मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी तब दलित अत्याचार के मामलों में एससी-एसटी एक्ट लगाने पर उनका जोर रहता था. भाजपा में इस पर बेचैनी फैली थी और उसने विरोध भी दर्ज कराया था. जल्दी ही  भाजपा से उनके रिश्ते बिगड़ गये थे. उसका एक कारण यह एक्ट भी था.

आज फिर स्थितियां बदल गयी हैं. 2012 के विधान सभा और 2014 के लोक सभा चुनाव ने उन्हें हाशिये पर धकेल दिया. भाजपा ने उनके दलित वोट में सेंध लगायी. आज उन्हें अपने दलित आधार को वापस पाने की सख्त जरूरत है. इसीलिए वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बहाने भाजपा पर खूब हमलावर हैं.

https://hindi.firstpost.com/politics/supreme-court-sc-st-act-decision-mayawati-is-supporting-protests-but-she-had-also-made-a-decision-similar-to-supreme-court-tk-102141.html
    




Wednesday, April 04, 2018

झूठी खबरें तो रोकनी ही होंगी



टीवी के पर्दे पर किसी क्रीम से चुटकियों में कमर दर्द या मुहांसे गायब होते हम रोज देखते हैं. हम जानते हैं कि ऐसा वास्तव में नहीं होता. यह मिथ्या या कह लीजिए अतिरंजित प्रचार है, विज्ञापन है. लेकिन समाचारों पर  हम भरोसा करते हैं. अगर समाचार असत्य हो, मुनाफे के वास्ते या किसी की लोकप्रिय छवि बनाने अथवा बिगाड़ने के लिए मिथ्या प्रचार को समाचार का रूप दिया जाए तो? जनता तो समाचार को सत्य ही मानती आयी है. इसलिए आज के समय में किसी भी उद्देश्य से हो, झूठ को समाचार के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. इसी कारण वर्तमान युग को उत्तर-सत्य’ (पोस्ट-ट्रुथ) समय कहा जाने लगा है. यानी सत्य के रूप में जो पेश किया जा रहा है, वह अंतिम नहीं है.  उसके बाद, उसके पीछे कुछ और सत्य है.

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने झूठी खबरेंदेने वाले पत्रकारों पर अंकुश लगाने की पहल करके इस मुद्दे को हवा दे दी. प्रस्ताव की जानकारी होते ही मीडिया जगत में हल्ला मच गया. इसे पत्रकारों पर बंदिश लगाने के मोदी सरकार के कदम के रूप में देखा गया. मोदी सरकार वैसे ही मीडिया को येन-केन-प्रकारेण अपने पक्ष में करने के आरोपों से घिरी है. कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इसकी तुलना राजीव गांधी के दौर में लाये गये अवमानना विधेयक और इंदिरा गांधी के आपाकाल से करते हुए व्यापक आंदोलन की अपील की. गनीमत हुई कि वैसी नौबत आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मृति ईरानी की ओर से हुई पहल पर रोक लगा दी.

इससे चुनावी वर्ष में मीडिया को दबाने के प्रयाससे जनित आक्रोश तो शांत हो गया है लेकिन फेक न्यूजया झूठी खबरों का मामला गर्म बना हुआ है. यह मुद्दा आज पूरी दुनिया में जेरे बहस है. 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से डॉनल्ड ट्रम्प के उतरने और अंतत: जीतने के बाद अमेरिकी राजनीति और पत्रकारिता आये दिन फेक न्यूजके आरोप-प्रत्यारोपों से घिरे रहे. मीडिया ने ट्रम्प के रोजाना झूठ बोलने की पोल खोली तो ट्रम्प फेक मीडियाको झूठी खबरों के लिए लताड़ने से लेकर पुरस्कृतकरने की घोषणा तक गये.

अपने देश में 2012 से नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से मिथ्या समाचारों का मामला ज्यादा बड़ा और गर्म होता गया. मोदी सरकार, भाजपा और उसके विभिन्न कट्टर हिंदू संगठनों से लेकर मीडिया के बड़े वर्ग पर मोदी सरकार के पक्ष में झूठी या अतिरंजित खबरें देने तथा मिथ्या प्रचार से प्रधानमंत्री की छवि चमकाने के आरोप लगे. गोदी मीडियाजैसा जुमला गढ़ा गया. विपक्ष की तरफ से उसी तर्ज पर जवाब देने की कोशिशें होती रही हैं.

मिथ्या समाचारक्या हैं, इस पर विवाद होते हैं. क्या वही खबरें झूठी हैं, जो बिना किसी आधार के किसी एक पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए गढ़ी गयी हों? क्या वे समाचार इस श्रेणी में नहीं आते जो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर किसी के पक्ष में पेश किये जाते हैं? बिना तथ्यों की जांच किये, मामले की गहराई में गये बिना, सभी पक्षों को सुने बिना, एकांगी दृष्टि से लिखे गये और प्रायोजित  समाचार क्या मिथ्या श्रेणी में नहीं आते?

पत्रकारिता का मूल मंत्र है निष्पक्ष होकर प्रत्येक कोण से समाचार की पड़ताल करना. सावधान रहना कि कोई भी गलत या अपुष्ट सूचना न जाने पाये. किसी सूचना पर संदेह हो और पुष्टि न हो पा रही हो तो उसे छोड़ देना. ऐसे समाचारों से परहेज करना जो सत्य होने के बावजूद समाज को तोड़ने, अविश्वास फैलाने और फसाद खड़ा करने का कारण बनते हों. आज पत्रकारिता के ये मानदण्ड लगभग ध्वस्त हो गये हैं. मिशन से धंधा बन गयी पत्रकारिता नैतिकता और सरोकारों से बहुत दूर चली गयी है. मीडिया घरानों के अपने स्वार्थों से लेकर राजनैतिक निष्ठाओं के लिए पत्रकारिता इस्तेमाल की जा रही है. कुछ वर्ष पहले तक बड़ा अपराध माने जाने वाले पेड न्यूजआज स्वीकार्य जैसे हो गये हैं. धन लेकर कुछ भी प्रसारित करने की कई बड़े मीडिया घरानों की स्वीकारोक्ति वाले हाल के कोबरा पोस्टस्टिंग ने इसीलिए बहुत सनसनी नहीं मचायी.

सोशल मीडिया प्लेटफार्मों ने हद कर दी है. वहां फेक न्यूजकी बाकायदा फैक्ट्री चलती हैं. हर एक के हाथ में मोबाइल है और झूठे समाचार त्वरित गति से प्रसारित हो रहे हैं. वहां पत्रकार होने की जरूरत भी नहीं है. राजनैतिक दलों के आई टी सेल सही-गलत समाचार फैलाने में दिन रात लगे हैं. जनता के लिए यह समझना कठिन होता है कि क्या झूठ है और क्या सच. डिजिटल मीडिया पर प्रसारित होने हाले झूठ की पोल खोलने वाली कुछ साइटें भी सक्रिय हुई हैं. उनका मानना है कि जिस गति से मिथ्या समाचार गढ़े और फैलाये जा रहे हैं, उस गति से उनका झूठ पकड़ना और जनता तक पहुंचाना सम्भव नहीं है. तथ्यों की पड़ताल में समय लगता है. झूठ फैलाने में कोई वक्त नहीं लगता.

इसका समाधान क्या है? स्मृति ईरानी जो करने जा रही थीं, क्या उससे इसे रोका जा सकता है? पूरी आशंका यह है कि इस बहाने मीडिया पर सरकार का मनचाहा अंकुश लग जाता मगर झूठ की फैक्ट्रियां कतई बंद नहीं होतीं. मीडिया संगठनों और विरोधी दलों ने इसीलिए इसका बड़ा विरोध किया.

हाल ही में राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने सरकारी अधिकारियों को बचाने के बहाने मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी. 2012 में राहुल गांधी की करीबी सांसद मीनाक्षी नटराजन ने राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में मीडिया को नियंत्रित करने की मंशा से एक निजी विधेयक तैयार किया था. सन 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और 1982 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने भी प्रेस पर सरकारी नियंत्रण की कोशिश की थी. ये सभी प्रयास देश-व्यापी विरोध के बाद वापस लेने पड़े थे.

फेक न्यूज से लेकर अपुष्ट एवं एकपक्षीय समाचार पत्रकारिता के लिए तो धब्बा हैं ही, हमारे समाज की बहुलता और लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं. इसकी रक्षा के लिए जिस मीडिया की स्वतंत्रता बहुत जरूरी है, वही अब इसके लिए खतरा भी पैदा करने लगी है. मगर मीडिया पर बाहरी, खासकर सरकारी  नियंत्रण के खतरनाक परिणाम होंगे.  मीडिया को ही अपनी विश्वसनीयता के लिए आत्मनिरीक्षण और सतर्कता के उपाय करने होंगे. पत्रकारिता को अपने पुराने मूल्य पुन: स्थापित करने होंगे. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संचालित करने वालों को झूठे समाचार फैलाने का उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए ताकि वे सिर्फ धंधे पर ध्यान न दें, अपने प्लेटफॉर्म पर आने वाली सामग्री पर भी नजर रखें और कुछ मानदंड बनाएं.

(प्रभात खबर, 5 अप्रैल, 2018)
  


Friday, March 30, 2018

गरीब का शव और विधायक निधि



शारीरिक रूप से निश्शक्त (जिसे पता नहीं किस खुशी में दिव्यांग कहा जाने लगा है) बाराबंकी का एक युवक गम्भीर रूप से बीमार अपने पिता को ठेलिया पर खींचते हुए करीब आठ किमी दूर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक ले गया. डॉक्टर ने पाया कि वह मर चुका है. लाश को वापस घर तक ले जाने की समस्या आ खड़ी हुई. काफी इंतजार के बाद भी कोई इंतजाम न हुआ तो वह अशक्त युवक उसी ठेलिया पर पिता का शव रखकर गांव वापस ले गया.

जिस दिन अखबारों में यह खबर छपी ठीक उसी दिन मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने विधान सभा में घोषणा की कि प्रदेश के विधायकों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाली विधायक निधि की राशि डेढ़ करोड़ रु से बढ़ाकर दो करोड़ कर दी गयी है.

प्रकट में दोनों खबरों में कोई परस्पर सम्बंध नहीं है. एक खबर गरीबों की दुर्दशा का हाल बताती है. दूसरी, हमारे विधायकों की विकास-क्षमता और सामर्थ्य की. गरीबी आज की है नहीं और न चुटकियों में दूर हो सकती है. बाराबंकी के अशक्त युवक को कम से कम एक ठेलिया तो उपल्ब्ध थी. कई वाकये ऐसे सामने आते हैं जहां गरीब-गुरबे शवों को कंधे पर लाद कर ले जाने को मजबूर होते हैं. साइकल पर भी अस्पताल से घर तक शव ढोने के चित्र गांव-देहातों से आते रहते हैं.

विधायक निधि निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को इसलिए दी जाती है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों का विकास अपने हिसाब से करा सकें. वे सिफारिश करते हैं और सरकारी तंत्र उनके बताये काम प्राथमिकता से करा देता है. पहले यह रकम कम होती थी. जैसे-जैसे विधायकों की विकास के प्रति रुचि बढ़ती गयी, निधि का आकार भी  बढ़ता गया. महंगाई के हिसाब से भी रकम को बढ़ना ही चाहिए. इसमें जनता ही का फायदा है. एक निश्शक्त गरीब का अपने पिता का शव आठ किमी तक ठेलिया पर ढोने का विधायक निधि से क्या सम्बंध?

पीएचसी, सीएचसी इलाज करने के लिए हैं. बीमार आएगा तो डॉक्टर  इलाज करेगा. बीमार की रास्ते में मृत्यु हो जाये तो डॉक्टर अफसोस में सिर हिलाने के अलावा और क्या कर सकता है? वहां मौजूद डॉक्टर ने ठीक ही कहा कि सीएचसी में शव भिजवाने की कोई व्यवस्था नहीं है. जो उस समय मौजूद नहीं थे, उन प्रभारी महोदय ने बड़ा मानवीय बयान दिया कि यदि मैं होता तो शव भिजवाने की व्यवस्था करता, चाहे अपनी जेब से देना पड़ता. वे वास्तव में क्या करते, इस पर अनुमान लगाने से क्या फायदा. गांवों में प्रधान या प्रधान-पति भी होते हैं. सम्बद्ध प्रधान ने कहा कि वे बाहर थे, इसलिए मदद नहीं कर सके.

विकास की बयार चली है. इसलिए मीटिंग खूब होती रहती हैं. डॉक्टरों को, प्रधानों को अधिकतर समय महत्त्वपूर्ण बैठकों में लगाना पड़ता है. विधायकों को तो क्षेत्र में रहने या दौरे करने की फुर्सत ही नहीं होती. राज्य सभा के चुनाव ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं कि एक गरीब के शव का मामला? 

इतने बड़े देश के सबसे बड़े प्रदेश में गरीबों की भरमार है. कैसी-कैसी बीमारियां और कैसी-कैसी मौतें. जब तक सबका विकास नहीं हो जाता तब तक ऐसा होगा ही. इसलिए, ठेलिया में शव रख कर आठ किमी धकेल कर ले जाने की खबर छपनी ही नहीं चाहिए. ऐसी खबरें आती हैं तो दिमाग में सवाल उठने लगते हैं. जैसे यही कि विधायक निधि के दो करोड़ हो जाने और एक गरीब का शव ठेलिया में ढोने की खबर में क्या कोई सम्बंध है?

वैसे, सोचिए तो कि दोनों में सम्बंध होना चाहिए?   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 31 मार्च, 2018)



Friday, March 23, 2018

लक्षणों के इलाज से थाने नहीं सुधरने वाले



एनबीटीयानी आपके इस अखबार ने लखनऊ के पांच थानों में स्टिंग ऑपरेशन करके पुलिस को आईना भर दिखाया था. पुलिस महानिदेशक ने उस रिपोर्ट पर ध्यान दिया और पांचों थानों के प्रभारियों को लाइन हाजिर करके मामले की जांच बैठा दी. भोला-सा सवाल सिर उठाता है कि जांच किस बात की होगी, एनबीटी के स्टिंग में सामने आये रिश्वतखोरी और जनता को बेवजह परेशान करने  के मामलों की सच्चाई की या पुलिस थानों के काम-काज और पुलिसजनों के आम व्यवहार की?

वैसे, दोनों ही मामलों में जांच कराने की जरूरत क्या है? पुलिस महानिदेशक हों या एसएसपी या कोई भी पुलिस अधिकारी, क्या उन्हें मालूम नहीं कि उनके थाने कैसे काम करते हैं? थानों की बंधी-बंधाई गैर-कानूनी मासिक आय के आधार पर उनकी कीमत क्या उच्चाधिकारियों से छुपी है? कोई भी बता देगा कि राजधानी का सबसे कीमती थानाकौन है और लाइन हाजिर होना कोई सजा न होने के बावजूद क्यों बड़ी सजा माना जाता है?  आखिर यह किस आधार पर तय होता है?

कई सरकारें आईं-गईं, बड़े-बड़े दावे करने वाले पुलिस महानिदेशक आये और गये, पुलिस का रवैया नहीं सुधरा. थानों में एफ आई आर लिखवानी हो या पासपोर्ट सत्यापन हो या सड़क किनारे खड़े खोंचे-ठेले, पुलिस को कुछ दिये बिना किसी का काम नहीं चलता. हर नियम का उल्लंघन पुलिस करने देती है और उसकी कीमत वसूलती है. नियम का पालन हो या अपने दायित्त्वों का, वह भी पुलिस बिना कुछ लिये नहीं करती. वह साक्षात देवता है जिसे अच्छे-बुरे हर काम के लिए चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है.

इसलिए, इस जांच की कोई उपयोगिता नहीं है. अधिक से अधिक स्टिंग में पकड़े गये पुलिस वालों पर कुछ और कार्रवाई हो जाएगी. कुछ के लाइन हाजिर, निलम्बित या बर्खास्त होने से पुलिस महकमा, खासकर थाने नहीं सुधरते.

जांच होनी ही हो तो इसकी हो कि थानों में ऐसा होता क्यों है? अतिक्रमण करने वालों से वसूली तो चलिए, गलत काम करते रहने देने के लिए होती है मगर पासपोर्ट सत्यापन के लिए किसी छात्र या बेरोजगार से रिश्वत क्यों मांगी जाती है? नहीं देने पर गलत रिपोर्ट क्यों भेज दी जाती है? उस छात्र का क्या दोष है? डकैती की रिपोर्ट लूट में इसलिए लिख लेते हैं, माना, कि अपराध की गम्भीरता कम दिखा के थाने की इज्जत बनायी रखी जाए लेकिन मार्क्सशीट गुम होने की रिपोर्ट लिखने से भी किसी को क्यों टरकाया जाता है? इस रिपोर्ट के बिना उसकी दूसरी मार्क्सशीट नहीं बन सकती. उससे रिश्वत क्यों मांगी जाती है?

इस महामारी की जड़ें थानों में नहीं मिलेंगी. उसके लिए पुलिस प्रशासन को अपने पूरे तंत्र में झांकना होगा. थानों की बीमारियां सिर्फ लक्षण हैं. रोग के कारण ऊपर छिपे मिलेंगे. इसलिए थाना प्रभारियों को लाइन हाजिर करके इसका निदान नहीं होगा. रोग ऊपरहै तो इलाज भी वहीं का होना चाहिए.

पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह की सिफारिशें, उनकी पी आई एल पर सुप्रीम के दिशा-निर्देश ही देख लें तो बीमारी और उसके कारणों का पता चल जाता है. क्या वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश मानने में राज्यों ने आज तक हीला-हवाली कर रखी है? साफ है कि सरकारें और उन्हें चलाने वाले नेता एवं अधिकारी नहीं चाहते कि पुलिस व्यवस्था में आमूल सुधार हों.  

अतएव, थाने वैसे ही बने रहेंगे, जैसे कि वे हैं.  सामान्य जनता पुलिस थानों में वैसे ही प्रताड़ित होती रहेगी, जैसा कि एनबीटी स्टिंग में पाया गया. कार्रवाई के नाम पर गाहे-ब-गाहे कुछ पुलिसवाले लाइन हाजिर या निलम्बित हुआ करेंगे, बस,  
  
 (सिटी तमाशा, नभाटा, 24 मार्च 2018)