Tuesday, July 10, 2012

शेरदा ‘अनपढ़ ’: सहज लोक अभिव्यक्तियों के बडे़ कवि
 नवीन जोशी
सन् 1971 में जब मैंने हाईस्कूल पास किया तब अंग्रेजी पाठ्य पुस्तक में सरोजनी नायडू की एक कविता थी- ‘वीवर्स’ यानि बुनकर। कवियित्री बुनकरों से पूछती है- यह प्यारा-सा कपड़ा किसके लिए बुन रहे हो? जवाब आता है- एक नन्हा-मुन्ना शिशु इस संसार में आया है, उसके लिए। तीन छन्दों की इस कविता में इसी तरह सवाल-जवाब होते हैं। दूसरे में जवाब आता है- दो दिल एक हुए हैं, उनके ब्याह के लिए और तीसरे में वे बताते हैं- एक शरीर दुनिया में अपना काम निबटा कर जा रहा है, उसके कफन के वास्ते। तीन छन्दों में पूरा जीवन दर्शन पेश करने वाली यह कविता मास्टर जी ने कुछ इस खूबी से पढ़ाई थी कि मन में पैठी रह गई।
उसी साल या शायद अगले बरस आकाशवाणी, लखनऊ के ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम की कवि गोष्ठी में शेरदा को पहली बार सुना और उनकी ‘जग-जातुरि’ कविता ने सरोजिनी नायडू की उस कविता की याद ताजा कर दी- ‘खरीदनैई लुकुड़ लोग, एक्कै दुकान बटि, क्वै कै हूँ लगनाक्, क्वै कै हूँ कफनाक्।’ तब पता नहीं था कि शेरदा ‘अनपढ़’ औपचारिक स्कूली शिक्षा में ‘जीरो’ हैं। यूँ, जीवन की कविता को स्कूली शिक्षा चाहिए भी नहीं होती। बाद में यह जानकर उनके प्रति आदर और श्रद्धा और बढ़ गए थे। उन्होंने उस कवि गोष्ठी में आमंत्रित सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया था और औपचारिक रिकार्डिंग हो जाने के बाद भी देर तक उनसे कविताओं की फरमाइश होती रही। शेरदा ने उस दिन ‘मुर्दक बयान’ और ‘मौत और मनखी’ जैसी कविताएँ भी सुनाईं थीं। बाद में तो ये और ऐसी कई अन्य कविताएँ भी उनसे सुनीं। शेरदा उन कवि गोष्ठियों के हीरो हुआ करते थे। शेरदा के नाम से श्रोताओं की भीड़ बढ़ जाती थी। आकाशवाणी के गैर कुमाउँनी कर्मचारी-अधिकारी भी मुग्ध श्रोता बन जाते थे। कई लोग शेरदा को अपने घर आमंत्रित करते और वहाँ भी उनकी कविताएँ बार-बार सुनी जातीं। बाद में जब हमने ‘आँखर’ संस्था बनाई तो शेरदा के लखनऊ आने पर किसी बड़े सभागार में कवि गोष्ठी रखी जाती और हॉल खचाखच भर जाता।
 शेरदा ‘अनपढ़’ थे ही ऐसे और कविता सुनाने का उनका अंदाज भी निराला। गंभीर-दार्शनिक कविताएँ सुनाते तो जीवन की बेरहम सच्चाई माहौल पर तारी हो जाती और हास्य-व्यंग्य पढ़ते तो श्रोताओं के पेट में बल पड़ जाते, पसलियाँ दुःखने लगतीं, लेकिन लोट-पोट श्रोताओं को वे स्टेच्यू बनकर देखते रहते। उनका मुँह अंतिम शब्द के उच्चारण में खुला रहता और दोनों हाथ हवा में। वे कविता सुनाने के विशिष्ट अदाकार थे और श्रोताओं को पूरा मौका देते थे- हँसें कि रो लें!
शेरदा के कविता सुनाने के अंदाज का एक किस्सा वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ ने मुझे बहुत पहले सुनाया था। शेरदा दो अक्टूबर, गांधी जयंती पर काव्यपाठ के लिए आकाशवाणी के लखनऊ स्टूडियो बुलाए गए थे। घर में बता आए थे कि अमुक दिन, अमुक समय रेडियो पर मेरी कविता सुनना। निर्धारित समय पर शेरदा की करुण आवाज रेडियो पर गूँजने लगी-‘‘बापू, आज मैं कै तुमरि भौत याद ऊँनै।’’ पहाड़ में कविता सुन रही शेरदा की इजा रोने लगी- ‘आज म्यार शेरू पर लखनऊ में जाणि के मुसीबत ऐगै। आपण बापू कैं धत्यूण रौ….।’ किस्सा सच है या झूठ, पता नहीं लेकिन इतना सत्य है कि शेरदा की आवाज किसी को भी भीतर तक छू जाती थी।
शेरदा महफिल के साथ बह भी जाते थे। गम्भीर से गम्भीर कविता की किसी पंक्ति पर अगर कहीं श्रोता हँस दिए तो वे उसे हास्य कविता की तरह पढ़ने लगते और अर्थ के अनर्थ निकलने लगते। तीन वर्ष पहले कौसानी में पंत-मटियनी स्मृति समारोह के दौरान काव्यपाठ में यही हुआ। वे अपनी कविता ‘तू को छै’ सुना रहे थे। यह अद्भुत दार्शनिक कविता है। शेरदा ने पढ़ा-‘नै दाबणी, तु को छै?’ श्रोता हँसे तो शेरदा हँसाने पर ही तुल गए। तब बटरोही ने उन्हें टोका और सही टोका- ‘शेरदा, यह तुम्हारी हास्य कविता है क्या ?. …’ फिर शेरदा गंभीर हो गए और कविता के गूढ़ार्थ उभरने लगे।
‘चितक छारण तक बगाओ-बगाओ है गे….’ हो या ‘फटफटै नी हुनी चप्पल कि ल्या छा यस….’ शेरदा कविता का सिरा वहाँ से पकड़ लाते थे जहाँ पहाड़ी जीवन की आम दिनचर्या कुलबुलाती थी। चिता के पूरी तरह राख होने से पहले ‘बगाओ-बगाओ’ तो हमारा सनातन दुख है लेकिन कल्पना कीजिए जब पचास-साठ के दशक में सुदरू पहाडी़ गाँवों में हवाई चप्पल पहुँचने लगी होगी। कंकड़-काँटे, पाला-बरफ में नंगे पैर चलने वाली स्त्रियों के पैरों में पहले तो हवाई चप्पल टिकती ही मुश्किल से होगी और जब टिकाने के लिए अंगूठे व अंगुलियों से कस कर जकड़ ली तो ससुरी ‘फट-फट’ ही नदारद हो गई! ‘उत्तरायण’ से निकलकर कौतिकों-कैसेटों तक यह गीत सर्वाधिक लोकप्रिय यूँ ही नहीं बना।
शेरदा को जीवन की गजब दार्शनिक एवं व्यावहारिक समझ थी। यही उनकी कविताओं का प्राण है और यही कारण है कि उनकी कविताएँ कई कालजयी कविताओं के करीब लगती हैं या उनकी याद दिलाती हैं। उनकी ‘तू को छै’ कविता पंत की ‘मौन निमंत्रण’ के बहुत करीब लगती है तो कुछ दूसरी कविताएँ कबीर की रचनाओं की याद दिला देती हैं, जैसे-‘जा चेली जा सौरास’, ‘एक स्वैंण देखनऊँ’, ‘हँसू कि डाड़ मारूँ’ आदि। शेरदा मूलतः हास्य कवि नहीं हैं, हालाँकि हास्य और तीखा व्यंग भी उनकी रचनाओं में बहुत सहज और स्वाभाविक रूप में आता है। वे मूलतः दार्शनिक कवि हैं, जीवन के गूढ़ार्थों की व्याख्या वे अत्यंत सहजता से करते हैं। वे एक लाइन कहते हैं और पाठक व श्रोता अर्थों में गहरे डूबने लगते हैं।
शेरदा ने बड़ा विकट जीवन जिया। घरेलू नौकर से लेकर फौज की नौकरी, फिर बीमारी का दौर और आर्थिक कष्ट, फिर गीत-नाटक प्रभाग की नौकरी। इस जीवन यात्रा के अनुभवों ने उन्हें संसार के प्रति कबीर जैसी दृष्टि दी तो कष्टों को काटने-सहने के लिए उन्होंने निपट हास्य का सहारा लिया। इसलिए उनका हास्य भी बनावटी नहीं है और बहुधा उसमें त्रासदियाँ छुपी हुई हैं।
यह बात नोट की जानी चाहिए कि वे आम पहाड़ी अभावग्रस्त जीवन की त्रासदियों को ही हास्य के रूप में पेश करते रहे हैं। हास्य कवि की छवि ने शेरदा ‘अनपढ़’ की कविता का नुकसान ही किया। फायदा सिर्फ यह हुआ कि हास्य कविता के बहाने गंभीर कुमाउँनी कविता के श्रोता भी खूब जुड़े, जिसे राजीव ने शेरदा की ‘मास अपील’ कहा है।
बाद के दिनों के शेरदा को देखकर मुझे अक्सर यह भी लगता रहा कि खुद शेरदा ने यह गलतफहमी पाल ली थी कि वे हास्य कवि ही हैं. शायद इसी कारण वे अपनी गंभीर और अच्छी कविताओं को भी चलताऊ हास्य की तर्ज पर सुनाने लगे थे। श्रोता तो खैर उन्हें अपनी खिलखिलाहटों और तालियों में बहा ही ले जाते थे। बहरहाल, शेरदा के जाने के बाद अब उनका मूल्यांकन हास्य कवि की छवि को ध्वस्त करके ही किया जाना चाहिए।
( नैनीताल समाचार, 15 से 30 जून 2012,में प्रकाशित)