Saturday, January 24, 2015

ये चराग जल रहे हैं-1/ एक थी रेणु



भैंसाकुण्ड घाट पर सजी चिता में लिटाने से पहले कफन हटाया गया तो उसका चेहरा आखिरी बार दिखा. बहुत शांत और निश्चिंत. चिन्ता और दर्द का कोई चिन्ह नहीं. कोई महीने भर पहले उसे अस्पताल में देखा था, बहुत व्याकुल और परेशान. घातक बीमारी, डायलिसिस और उससे उपजी दूसरी तकलीफों से त्रस्त. मुझे देख कर वह थोड़ा मुस्कराई- “नवीन, तूने पहले ही कहा था कि पी जी आई दिखाते हैं....” साल भर बाद उसे पीजीआई ले भी गए थे पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इसलिए उसकी आवाज़ में बहुत अफसोस था उस दिन. फिर लता से कहा- “गुड्डी, ज़रा पीठ मल देगी...बहुत दर्द है.” दर्द उसके पूरे चेहरे पर तारी हो गया था.
दर्द से ऐंठा हुआ रेणु (पाण्डे) का वह चेहरा मेरे कहीं भीतर तक चुभ गया था जो भूला नहीं जाता लेकिन उस दिन चिता पर वह बेहद सुकून में लेटी थी- सारे दुख-दर्दों, चिंताओं और तनावों से बहुत दूर, जहां कुछ नहीं व्यापता.
चिता पर लेटी रेणु का पुरसुकून चेहरा मुझे बहुत पीछे खींच ले गया. 1971 के बाद का समय. आकाशवाणी लखनऊ का कुमांऊनी-गढ़वाली कार्यक्रम “उत्तरायण” लखनऊ के संस्कृतिकर्मियों का मिलन स्थल था. जीत जरधारी और बंसीधर पाठक “जिज्ञासु” उसके केंद्र थे. अपनी बोलियों के लेखक, कवि, नाटककारों के अलावा गीत-लोकगीत गाने वाले-वालियों की अच्छी खासी टोलियां लखनऊ में तैयार हो गई थीं. उस दौर में नए-पुराने बहुत सारे लोगों से मुलाकातें-दोस्तियां हुईं. इन्हीं में रेणु भी थी, संगीतज्ञ पीताम्बर पाण्डे की प्रतिभाशाली संतानों में एक, अपने भाई-बहनों की तरह गायन में निपुण लेकिन उनसे अलग भी.
अपनी उन्मुक्त खिलखिलाहटों, स्नेहिल-सहयोगी स्वभाव और मिलनसारिता के बावज़ूद रेणु के भीतर एक विद्रोही लड़की थी. यह विद्रोह अनेक स्तरीय था और दुविधाग्रस्त भी. वह अच्छा गाती थी लेकिन रेडियो कार्यक्रमों के लिए किसी अधिकारी के आगे-पीछे नहीं घूम सकती थी, बल्कि कई बार कार्यक्रम ठुकरा देती थी. ठीक-ठाक नौकरी के कारण वह आत्मनिर्भर थी और इसीलिए उनकी भी आलोचना कर ले जाती थी जिनकी हां में हां मिलाना बहुतों की मज़बूरी थी. 1974 में जब हमने “शिखर संगम” संस्था बनाई और उसके बंद होने पर 1978 में “आंखर” का गठन किया तो अपने इसी विद्रोही किंतु दुविधा ग्रस्त स्वभाव के कारण वह उनमें शामिल होकर भी अलग जैसी थी और बाद में बिल्कुल ही दूर हो गई. लता से उसकी गाढ़ी दोस्ती थी और इसी कारण मैं रेणु के सपनों, उसकी इच्छाओं, कुण्ठाओं और हताशाओं का भी साक्षी रहा. उसकी दुविधाओं ने सब कुछ उसके भीतर ही घोट दिया.
उन संदर्भों का ज़िक्र करने का अब कोई मतलब नहीं. सब उसी के साथ चला गया. चिता की राख के साथ नदी में बह गया. लड़कियों के सपने होते होंगे, मिट्टी के नहीं होते!
जिस दिन वह खाक में मिली, 18 नवम्बर को, उसी रात मुझे पटना वापस लौटना था, जहां आजकल मेरा डेरा है. रात को ट्रेन की बर्थ पर करवटें बदलते हुए याद आया कि पिछले साल 18 नवम्बर ही को वह हमारे साथ दिल्ली से ट्रेन में लौट रही थी. हमने वहां एक शादी में खूब मस्ती से पुराने दिन जिए और रेणु को चिढ़ाया भी. वह बीमारी से कमजोरी के बावज़ूद हंसी-गाई-नाची. पटना लौट कर अपने डेरे के निपट एकांत में मुझे कई दिन तक रेणु और उसके बहाने उस दौर के कई चहरे याद आते रहे. कहां-कहां से हम आए, किस तरह मिले, कैसे-कैसे रिश्ते बने, कैसा साथ गुज़रा और कौन चुपके से जाने कहां को चला गया! (क्रमश:)

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