Friday, November 27, 2015

सिटी तमाशा/ हमारे स्वाद और भाषा-बोली पर डाका!


- मैगी है, अंकल?’ हाथ में थामा नोट आगे बढ़ाए हुए एक बच्चा दुकानदार से पूछ रहा था. उसके चेहरे की उत्सुकता और व्याकुलता साफ पढ़ी जा सकती थी जो तुरन्त ही भारी निराशा में बदल गई जब दुकानदार ने तनिक मुस्कराते हुए में गरदन हिला दी.
- ऑनलाइन मिल रही है बेटा’. काउण्टर पर खड़े दूसरे ग्राहक ने बच्चे को बताया. लेकिन उसके पास सुनने का धैर्य नहीं था. वह तेज कदमों से किसी दूसरी दुकान की तरफ भागा चला गया. दिन भर छोटे-बड़े बच्चे और मम्मियां मैगी ढूंढने आने लगे हैं’- दुकानदार कह रहा था.
चंद हफ्तों के लिए मैगी क्या बंद हुई, बच्चों का मुंह लटक गया. मां का दूध सूख जाने पर भी उतनी व्याकुलता नहीं होती जितनी मैगी पर रोक लग जाने से हुई. अब धीरे-धीरे मैगी बाजार में वापस आ रही है तो छोटे बच्चों से लेकर युवा तक आनंदित हैं और मैगी पार्टी की तस्वीरें सोशल साइट्स पर सगर्व पोस्ट कर रहे हैं.
हमारी पीढ़ी की पीढ़ी का स्वाद बाजार के जादूगरों ने कैसे हर लिया है! भारतीय खाने की विविधता और पौष्टिकता की सर्वत्र चर्चा होती है लेकिन हमारी थालियों पर कैसा हमला हुआ है कि सारे स्वाद ही छिन गए. उस दुकान पर छिड़ी मैगी-चर्चा में एक महिला बता रही थी कि टेबल पर पराठा-पूरी या दाल-भात-रोटी रखो तो बच्चे कहने लगते हैं कि कुछ अच्छा खिलाओ. कुछ अच्छा माने मैगी, पास्ता, केएफसी... मैं तो मैगी में ही सब्जियां मिला देती हूं. क्या करूं, कुछ तो अच्छा बच्चों के पेट में जाए. आज यह हर घर की समस्या है.
क्या त्रासदी है कि स्वदेशी का राग अलापने और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ झण्डा उठाने वाले बाबा रामदेव अपनी कम्पनी के नूडल्स लेकर बाजार में आ गए हैं. जल्दबाजी इतनी कि इसके लिए उन्होंने भारतीय खाद्य सुरक्षा और नियामक प्राधिकरण से आवश्यक लाइसेंस भी नहीं लिया. मैगी पर रोक लगने के बाद उन्हें मुनाफे का अच्छा मौका दिखा होगा. मैकरोनी, स्पाघेटी और वर्मिसेली वे पहले से बेच ही रहे हैं. इसमें कैसा स्वदेशी आंदोलन है? देसी स्वाद तो धीरे-धीरे मारे जा रहे हैं, उस पर हमला बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हो या तथाकथित भारतीय आश्रमों का.
मैगी हो पिज्जा या केएफसी या ढेरों दूसरे विदेशी व्यंजन उन्हें खाने में कोई हर्ज नहीं. बल्कि, दुनिया भर के स्वाद जरूर लेने चाहिए. आज पूरी दुनिया मुट्ठी में है तो जितनी हो सके भाषाएं सीखिए, पहनावे धारण कीजिए और खान-पान बरतिए. कोई डण्डा नहीं चला रहा कि बाटी-चोखा, आलू-पूरी, डोसा-पोहा, वगैरह ही गले से नीचे धकेलते रहिए या धोती-कुर्ता-लुंगी-साड़ी ही धारण कीजिए. लेकिन यह जरूर देखिए कि अपने स्वाद, पहनावे और भाषा-बोलियों के साथ कैसा सलूक हम कर रहे हैं. जी हां, खान-पान और भाषा-बोलियों का परस्पर अंतरंग सम्बंध है. हम अपने स्वाद ही नहीं भूल रहे, भाषाओं को भी साथ ही मार रहे हैं. स्वाद छिनता है तो अपनी बोली-भाषा-लोकगीत-संगीत सब जाता रहता है.
यह सांस्कृतिक हमला बड़े शहरों से सीधे गांवों तक पहुंच गया है. गांवों के मेलों-हाटों-उत्सवों-ब्याह-काजों में सबसे ज्यादा मांग चाऊमीन वगैरह की हो रही है. सांस्कृतिक संध्याओं में लोक गीतों की बजाय फिल्मी धुनों पर लोक-नृत्य होते हैं. लोक संगीत और भाषा-बोली का हाल वैसा ही हो गया है जैसा किसी ढाबे में प्याज-लहसुन का छौंका लगाकर पकाई गई मैगी का होता है.
नवरात्र में कन्या पूजन के दिन अगर बच्चियों के सामने नूडल्स परोसे जाएं क्योंकि पूरी-हलवा-चना अब कोई खाता नहीं तो हमें कुछ सोचना चाहिए या नहीं?
(नभाटा, लखनऊ, में 27 नवम्बर को प्रकाशित)


Thursday, November 19, 2015

सिटी तमाशा/ जनाब, आप तो तहजीब के शहर के नाटक प्रेमी हैं!


बाबू हर दयाल वास्तव हास्य नाट्य समारोह में बुधवार को मसाज नाटक में अकेले ही कई चरित्रों को निभा रहे चर्चित अभिनेता राकेश बेदी हॉल में मोबाइल बजने और कैमरों के फ्लैश चमकने से इतना खिन्न हुए कि उन्हें अभिनय रोक कर दर्शकों को नाटक देखने की तमीज सिखानी पड़ी. एक अभिनेता के लिए किसी चरित्र में उतरना और उसे मंच पर जीना कितना दुस्साध्य होता है, कितने कंसंट्रेशन की जरूरत होती है, यह शायद आज के दर्शक समझते ही नहीं या वहां जाना भी जस्ट फॉर फन है. कुछ संजीदा नाट्य प्रेमियों ने अगर यह टिप्पणी की कि लखनऊ के दर्शकों में अब नाटक देखने की तमीज नहीं रही तो क्या गलत?

हाल के वर्षों में ऐसा कई बार हो चुका है. कुछ वाकए फांस की तरह गड़े हुए हैं. पिछले वर्ष लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल में सलीम आरिफ के निर्देशन में बहुत संजीदा नाटक हम सफर खेला जा रहा था जो पति-पत्नी के उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों के बहाने स्त्री-पुरुष सम्बंधों के विविध आयाम एवं आवेग पेश करता है. बहुत प्रभावशाली संवाद थे जो चिंतन-मनन की अपेक्षा करते थे. लेकिन दर्शक हर संवाद पर तालियां पीट रहे थे, गोया वे नाटक नहीं कोई प्रहसन या फिल्म देख रहे हों. पुराने दर्शक नाटक के बीच में ही नहीं, दृश्य परिवर्तन के दौरान भी तालियां बजाना आपत्तिजनक मानते थे. नाटक की कथा वस्तु, अभिनय और निर्देशक का संदेश ध्यान से ग्रहण कीजिए और तालियां अंत के लिए सुरक्षित रखिए.

सिर शर्म से झुक जाता है जब बाहर से आए मशहूर अभिनेता नाटक रोक कर दर्शकों से शांत रहने की चिरौरी-सी करते या नाराज़गी जताते हैं. वे याद दिलाते हैं कि आप तो तहजीब के लिए मशहूर लखनऊ के दर्शक हैं! लेकिन यहां तहजीब बची है क्या! दो-तीन वर्ष पूर्व मुम्बई से आए पसिद्ध अभिनेता अतुल कुलकर्णी गुलजार की नज्मों-डायरियों पर आधारित नाटक पेश कर रहे थे. देश विभाजन के समय हुए दंगों की भयावहता का प्रसंग था. एक पति-पत्नी दो बीमार बच्चों को लेकर ट्रेन की छत पर बैठे सीमा पार भाग रहे हैं. एक बच्चा मर गया. दहाड़ें मारती पत्नी को सम्भालते हुए पति निर्जीव बच्चे को नीचे फैंकता है लेकिन दुख, बदहवाशी और दहशत में जिंदा बच्चे को फैंक बैठता है. त्रासदी के इस चरम पर भी हॉल में मोबाइल बज रहे थे. अतुल कुलकर्णी ने एक-दो बार ध्यान नहीं दिया लेकिन फिर दुखी होकर नाटक रोक दिया और अपना आक्रोश व्यक्त किया था. जया बच्चन हजार चौरासी की मां में मां का किरदार निभा रही थीं. फोटोग्राफर मंच पर चढ़कर क्लोज अप लेने लगे और दर्शक उनसे हटने को कहने लगे थे. मां की पीड़ा का अभिनय छोड़कर जया ने लखनऊ के दर्शकों को लताड़ा था. तुगलक नाटक के दौरान प्रख्यात अभिनेता मनोहर सिंह ने दर्शकों को जो गुस्सा दिखाया था, वह पुराने नाट्य प्रेमियों को याद होगा.

आज हर हाथ में दो-दो मोबाइल हैं पर तमीज बहुत कम लोगों के पास है. नाटक जैसी सजीव प्रस्तुतियां देखने आने वाले भी उसे साइलेण्ट क्यों नहीं करते, ताज्जुब होता है. महिलाएं क्षमा करेंगी, गड़बड़झाला-पर्स के भीतर उनका मोबाइल बजता रहता है और वे उसे खोज ही नहीं पातीं. प्रेस फोटोग्राफरों को यह इल्म ही नहीं कि नाटक की सबसे सुंदर तस्वीर मंच की नियोजित प्रकाश सज्जा के साथ खींची जाती है. फ्लैश चमकाने से कलाकारों का कंसंट्रेशन टूटता है, सो अलग.
मंचन के दौरान ही नहीं, नाटक से पूर्व भी मोबाइल बंद करने अनुरोध किया जाना हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए. नहीं क्या?
(नभाटा, लखनऊ में 20 नवम्बर 2015 को प्रकाशित)



Tuesday, November 10, 2015

भाजपा-विरोधी राजनीतिक स्पेश से मुलायम बाहर, छाए लालू-नीतीश


बिहार विधान सभा चुनाव का एक स्पष्ट परिणाम आ चुका है.
भाजपा-विरोधी राजनीति के मंच पर लालू-नीतीश ने कब्जा कर लिया है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के हाशिए पर चले जाने से खाली इस स्पेश को उन्होंने पूरा भर दिया है.
बिहार चुनाव से पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने इस स्पेश को भरने के लिए बड़ी पहल की थी लेकिन आज वे इसके हाशिए पर चले गए हैं.
महागठबंधन बिहार में जीते या हारे, एक बात मानी जा चुकी है कि लालू-नीतीश की जोड़ी ने बिहार में भाजपा को जबर्दस्त टक्कर दी है. वह शुरू से बिहार के रण को आसान नहीं मान रही थी लेकिन मुकाबला इतना कठिन हो जाएगा, इसका अनुमान भी भाजपा को नहीं होगा. बिहार जीतने के लिए व्याकुल मोदी और अमित शाह की जोड़ी को बीच चुनाव में रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा. यह लालू की जातीय पकड़ और नीतीश सरकार के जमीनी कामों का नतीजा रहा.
बिहार को बदल देने के मोदी के नारे की तुलना में नीतीश के विकास कार्य सुदूर गांवों तक ज़्यादा चर्चा में रहे. भाजपा के तमाम नेता लालू की जातीय जोड़-तोड़ की जवाबी कुंजी खोजने में लगे रहे.
सन 2014 के अंत में मुलायम सिंह ने पुराने जनता परिवार के घटक दलों की एकता की पहल इसीलिए की थी कि लोक सभा चुनावों के बाद भाजपा-विरोधी सेकुलर राजनीति के अगुआ की जगह खाली हो गई थी. भारतीय राजनीति में यह बड़ी स्पेश है.
अब तक कांग्रेस इस भूमिका में थी जिसे 2014 में भाजपा के हाथों अब तक की सबसे बुरी पराजय झेलनी पड़ी. लालू-नीतीश समेत बाकी नेताओं ने मुलायम को यह दर्ज़ा दे भी दिया था. वे सर्वसम्मति से एकीकृत दल के अध्यक्ष बना दिए गए थे, अंतत: जिसका नाम भी तय नहीं हो पाया.
कारण चाहे जो रहे हों मुलायम ऐन चुनाव के मौके पर पैंतरा बदल गए. महागठबंधन से अलग चुनाव लड़ने की उनकी घोषणा ने सभी को चौंकाया. यही नहीं, उन्होंने लालू-नीतीश के बागियों को मिला कर तीसरा मोर्चा बनाया. तभी से उनको भाजपा की बजाय महागठबंधन-विरोधी भूमिका में ज़्यादा देखा गया.
कहना होगा कि मुलायम सिंह ने पैंतरे बदल कर बहुत बड़ा दांव खेला. फिलहाल तो वे इस दांव से खुद ही चित होते दिखते हैं. चुनाव परिणाम जो भी आए, क्या उसके बाद मुलायम सिंह भाजपा-विरोधी राजनीति के केंद्र में कहीं रह पाएंगे?
बिहार की जनता का फैसला तीन तरह का हो सकता है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को बहुमत मिले या महागठबंधन को या फिर किसी को भी बहुमत न मिले यानी त्रिशंकु जनादेश.
अगर एनडीए सरकार बनाने लायक जनादेश पा गई तो लालू-नीतीश का सबसे पहला हमला मुलायम सिंह पर होना है. अभी जो मुलायम भाजपा के साथ मिलकर बिहार में कई साल सरकार चलाने के लिए नीतीश को साम्प्रदायिक ठहरा रहे हैं, तब वही मुलायम बिहार में एनडीए की जीत का मार्ग प्रशस्त करने के अपराधी ठहराए जाएंगे. साम्प्रदायिक शक्तियों की मदद कर एनडीए को बिहार की सत्ता में आने देने का आरोप सीधे मुलायम सिंह पर लगेगा, वोट उन्हें चाहे जितने कम मिलें. मुलायम का तीसरा मोर्चा भाजपा विरोधी वोटों में ही सेंध लगा रहा है.
यदि महागठबंधन सरकार बनाने लायक जनादेश पा गया तो भी मुलायम की किरकिरी होनी है. उस हालत में लालू-नीतीश की जोड़ी निश्चय ही भाजपा विरोधी केंद्रीय राजनीति की चैम्पियन मानी जाएगी और मुलायम हाशिए पर चले जाएंगे. लालू अपने समधी को भले हलके में छोड़ दें मगर नीतीश ताने मारने से नहीं चूकेंगे कि मुलायम भाजपा का साथ देकर भी सेकुलर महागठबंधन को सत्ता में आने से नहीं रोक सके. गरज कर कहेंगे कि आज अगर साम्प्रदायिक शक्तियों को हराने की ताकत किसी में है तो वह हममें है, बिहार में है.
और, अगर स्पष्ट जनादेश नहीं आया तो भी महागठबंधन के नेता पानी पी-पी कर सपा मुखिया को कोसेंगे कि इस स्थिति के लिए वे ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि मुलायम साथ आ जाते तो महागठबंधन एनडीए को हरा कर राज्य में सरकार बना लेता.
तीनों ही स्थितियों में मुलायम की भूमिका पर सवाल उठने ही हैं. यह सवाल मुलायम के राजनीतिक मर्म पर चोट करने वाले होंगे. 2017 में यूपी के विधान सभा चुनाव होने हैं और मुलायम के सामने मुख्य चुनौती भाजपा ही पेश करने वाली है. वर्तमान में मुलायम की सारी पेशबंदियां भी इसी मुकाबले के लिए तैयार होने की हैं. राज्य मंत्रिपरिषद का ताजा पुनर्गठन हो या अमर सिंह से गलबहियां, मुलायम की नज़र यूपी के बड़े मुकाबले पर ही है.
मुलायम ने इस पर भी गौर किया ही होगा. शायद अपने तरकश में जवाबी तीर भी रखे हों. वे कुश्ती के अखाड़े से ज़्यादा राजनीति में अचानक कोई नया दांव चलने के लिए ख्यात हैं.
फिलहाल तो लालू-नीतीश की जोड़ी भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी है, जिसकी इस देश में बड़ी सम्भावना रही है. पहले यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश को आशीर्वाद देने वाली ममता बनर्जीं यूं ही नीतीश के साथ नहीं आ गईं. उनके राज्य में भी विधान सभा चुनाव आ रहे हैं.
(बीबीसी.कॉम में 03, नवम्बर 2015 को)



Thursday, November 05, 2015

सिटी तमाशा / सत्ता-शक्ति की उद्दण्डता राजधानी से गांव तक


क्षेत्र व जिला पंचायत चुनावों के नतीज़े के बाद सदस्य और ब्लॉक प्रमुख के पद खरीदने की रस्साकशी शुरू हो चुकी है. बोलियां लगाने और थैलियां खुलने का मौसम है. अब हैरत नहीं होती कि आम जन के हाथों में सत्ता पहुंचाने की यह संवैधानिक व्यवस्था काले धन का कैसा नंग-नाच बन गई है. सत्ता बल, धन बल और बाहुबल का कैसा खेल हुआ, है कोई हिसाब? राजनीतिक दल हिसाब इस बात का अवश्य लगा रहे हैं कि जहां दलीय राजनीति नहीं होनी थी वहां उन्हें कितना दलीय नफा-नुकसान हुआ. जहां रामलोटन और घुरई को अपने क्षेत्र के विकास के लिए निर्भय चुनाव लड़ना था वहां मंत्रियों के परिवार वालों ने सारे घोड़े खोल कर अमर्यादित चुनाव लड़ा. हार-जीत से अब उनकी प्रतिष्ठा का हिसाब हो रहा है.   
राजनीतिक सत्ता का चरित्र अब उद्दण्ड और निरंकुश ही होता है. पंचायतें हों या नगर निगम या विधान सभा और संसद से निकली सत्ताएं. विनम्रता, लोकतांत्रिक व्यवहार एवं जन-सम्मान अब वहां से गायब हो चुके हैं.
साइकल और मुख्यमंत्री के तस्वीर वाली झण्डी लगी गाड़ियों में सवार लोगों ने जब उत्पात मचाना शुरू किया तो लग गया था कि सपा की सरकार आ गई है. चुंगी कर्मचारियों की धुनाई, तोड़फोड़, जमीनों पर कब्जे और अफसरों की पिटाई पर कोई अंकुश पहले लगा था न अब. जनता ने इसकी आदत डाल ली है.
पिछले कोई डेढ़ साल से प्रदेश के भाजपाइयों को केंद्र की सत्ता का नशा है. सपा में अनुशासन की बात नहीं की जाती, भाजपा में की जाती है. व्यवहार में फर्क मगर कहीं नहीं है. नियमों को तोड़ना सबको भाता है. सत्ता में अपनी पार्टी हो तो क्या कहने. भाजपा के हिन्दुत्ववादी संगठन आजकल इसी लिए निरंकुश हो गए हैं. कमल वाली झण्डियां फहराती गाड़ियां विधान सभा मार्ग पर ऐसे खड़ी की जाती हैं जैसे वह उनकी निजी पार्किंग हो. बीते मंगल को उनकी वजह से यह मुख्य मार्ग करीब पांच घण्टे जाम रहा. पार्टी दफ्तर में बड़े-बड़े पदाधिकारी थे. दूसरी पार्टी से भाजपा में आए नेताओं का गर्वीला स्वागत हो रहा था. बाहर जो गदर मचा रहा उसकी चिंता किसी को नहीं थी. नेताओं की गाड़ियों को उनके गनर रास्ता बनवा कर निकलवा दे रहे थे. जाम में फंसे बाकी लोगों की फिक्र करने वाला कोई न था. ट्रैफिक पुलिस भी सदा की भांति रुतबे वालों की सेवा में तत्पर.
बहन जी के डर के बावजूद बसपा नेताओं की दबंगई के किस्से कम नहीं थे. चंद खास नेताओं की निरंकुशता वे बर्दाश्त कर लेती थीं मगर कई नेताओं पर उन्होंने सख्त कारवाई भी की. आम लोगों में इसकी चर्चा अब भी होती है. खैर, प्रदेश में कांग्रेसियों की सत्ता देखे चौथाई शताब्दि गुजर गई. इस बीच उद्दण्डता के मानक भी बदल गए. कभी वे प्रदेश की सत्ता में आए तो उनका नया रूप अगली पीढ़ियां देखेंगी.
नगर निगम के निर्वाचित पार्षदों को लगता है कि यदि उनके ड्राइवर ने गाड़ी दफ्तर से लगी भूमिगत पार्किंग में खड़ी कर दी तो उनकी नाक ही कट जाएगी. गाड़ियां सड़क पर उलटी-सीधी खड़ी करने से खूब शान बढ़ती है. पार्षदी की सत्ता उनके पास भी है ही. वे कैसे नियम मान लें. नियम-कानूनों का मखौल उड़ाने की ट्रैनिंग जो हो रही!
गांवों-कस्बों की सड़कें और खड़ंजे पिछले दिनों जिस तरह महंगी गाड़ियों से रौंदे गए, नकदी और शराब बंटी, लाठी-गोली चलीं और अब ब्लॉक प्रमुखी खरीदने के लिए थैलियां खुलने लगी हैं, उससे साफ है कि अब इन पंचायतों में क्या-क्या नहीं होगा. चहुं ओर सत्ता की धमक ही धमक!

(नभाटा, लखनऊ में 06 नवम्बर 2015 को प्रकाशित)

Tuesday, November 03, 2015

नहीं हुज़ूर, मुद्दा कानून-व्यवस्था का नहीं है / साहित्य-कला-संस्कृति-फिल्म-विज्ञान-इतिहास-उद्योग-आदि क्षेत्रों से पहली बार उठे प्रतिरोधी स्वर सुने जाने चाहिए.


देश में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता और नतीजे में दादरी के बिसाहड़ा गांव में गोमांस के नाम पर उकसाई भीड़ द्वारा अखलाक की हत्या के कोई दस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुप्पी तोड़ी. वह भी तब जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एकाधिक बार अपने भाषणों में देश को अपने मूलभूत लोकतांत्रिक, सभ्य और बहुलतावादी सामाजिक मूल्यों की याद दिलाई. राष्ट्रपति का सम्बोधन अपनी गरिमा के बावजूद गम्भीर चिंता जाहिर कर रहा था. उसके अगले दिन नरेंद्र मोदी ने जो कहा उसे उनकी चुप्पी तोड़ना माना गया लेकिन उन्होंने कहा क्या, इस पर गौर करना जरूरी है. प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंदू और मुसलमान तय कर लें कि उन्हें एक-दूसरे से लड़ना है या मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ. यह दार्शनिक किस्म का बयान वे पहले भी देते रहे हैं लेकिन इससे आगे उन्होंने माना कि दादरी काण्ड दुर्भाग्यपूर्ण है. फिर पूछा कि इसमें केन्द्र सरकार क्या कर सकती है?
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर मोदी सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लगातार यह कहते रहे हैं कि दादरी का जघन्य काण्ड हो या साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कन्नड़ लेखक कलबुर्गी अथवा तर्कवादियों नरेंद्र दाभोलकर और पानसरे की हत्याएं कानून व्यवस्था का मामला हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है.
मामला सिर्फ कानून व्यवस्था का होता तो राष्ट्रपति का चिंतित बयान आता न उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की तकलीफ मुखर होती. दादरी में जिस साजिश के तहत अफवाह फैला कर अखलाक की हत्या करवाई गई, उससे व्यथित होकर दूसरे ही दिन एक कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने कहा था कि राष्ट्र का दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक के लिए, उसकी आस्था और धार्मिक मान्यताएं कुछ भी हों, जीने का अधिकार सुनिश्चित करे. इस महत्वपूर्ण बयान का, जो वस्तुत: भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों पर आधारित है, इशारा साफ था. यह संकेत था कि संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार को देश में धर्म और आस्था के नाम पर चुनौती दी जा रही है और सत्ता का दायित्व है कि वह इसे रोके.
यह अकारण नहीं कि इसी दौरान देश भर के साहित्यकारों-कलाकारों-संस्कृतिकर्मियों-इतिहासकारों-फिल्मकारों-विज्ञानियों को लग रहा है कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है, असहिष्णुता लगातार बढ़ रही है तथा तर्क एवं विचारों से जवाब देने की बजाय विरोधी स्वरों को कुचला जा रहा है. दो महीने में भीतर देश के विभिन्न राज्यों से 40 से ज्यादा लेखकों ने अकादमी सम्मान समेत विविध राष्ट्रीय पुरस्कार वापस किए, प्रमुख विज्ञानी पी एम भार्गव ने पद्मभूषण लौटाया, पंजाबी लेखिका दलीप कौर टिवाणा ने पद्मश्री लौटाई, पद्मश्री लौताने वालों में बिल्कुल ताजा नाम हिमालयविद एवं इतिहसकार शेखर पाठक का है, कोंकणी रंगकर्मी माया ने संगीत नाटक अकादमी सम्मान वापस किया, मलयाली कवि के सच्चिदानंद ने साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया, दर्जनों फिल्मकारों ने राष्ट्रीय स्तर के सम्मान वापस किए और एक सौ से ज्यादा इतिहासकारों ने प्रतिरोध में अपनी आवाज मिलाई है. साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ने भी अक्टूबर के अंत में अपनी लम्बी चुप्पी तोड़ते हुए कलबुर्गी की हत्या की निंदा कर दी. मामला चूंकि सिर्फ साहित्य अकादमी की चुप्पी के विरोध तक सीमित नहीं था, इसलिए रचनाधर्मियों का विरोध जारी है.
विरोध का असल मुद्दा उदय प्रकाश की उस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है जो उन्होंने अकादमी सम्मान वापस करते हुए की थी- पिछले कुछ समय से हमारे देश में लेखकों, कलाकारों, चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक, अपमानजनक, अवमाननापूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है, जिसकी ताजा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है. अब यह चुप रहने का और मुंह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है. वर्ना ये खतरे बढ़ते जाएंगे. अकादमी सम्मान लौटाते हुए ऐसी बातें गुजराती कवि अनिल जोशी ने कहीं कि देश का वातावरण घृणामय हो गया है और लेखकों की आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिन गई है. कुछ धार्मिक पहचानें साम्प्रदायिक ताकतों के कारण खतरे में पड़ गई हैं. कोंकणी लेखक एन शिवदास ने कहा कि हम सनातन संस्था जैसे संगठनों, जो धर्म के नाम पर लोगों को बरगला रहे हैं और तर्कवादियों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार हैं, का लगातार विरोध करते रहे हैं और अब हम खुद पर खतरा महसूस कर रहे हैं. हमें धमकियां मिल रही हैं.
राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति परोक्ष रूप से और लेखक-कलाकार-इतिहास्कार-विज्ञानी- आदि साफ-साफ और जोर-जोर से ऐसी बातें कह रहे हैं तो मानना चाहिए कि देश में कहीं गम्भीर गड़बड़ी हो रही है. प्रतिरोध के इन स्वरों को कांग्रेसी या वामपंथी या नरेंद्र मोदी से घृणा करने वालों के बयान और कृत्रिम समस्या पैदा कर कृत्रिम विरोध कह कर अनदेखा नहीं किया जा सकता, जैसा कि केंद्र सरकार के कई मंत्री और हिंदू संगठनों के लोग कर रहे हैं.
इस देश में आजादी के पहले से कुछ साम्प्रदायिक शक्तियां सक्रिय रही हैं. विभाजन की भयानक मार-काट और महात्मा गांधी की हत्या ने इनके लिए खाद-पानी का काम किया. तब से देश के विभिन्न भागों में यदा-कदा दंगे होते रहे लेकिन देश की बहुलतावादी परम्परा पर साम्प्रदायिक तत्व कभी हावी नहीं हो पाए. 1990 के राम मंदिर आंदोलन, 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद देश भर में हुए दंगों ने इन ताकतों को खेलने का भरपूर मौका दिया. इसी दौर में पाकिस्तान-पोषित आतंकवाद चरम पर पहुंचा और राजनीतिक दलों ने, जिनमें भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद एवं विभिन्न हिंदू संगठनों के अलावा कांग्रेस और कतिपय मुस्लिम संगठन भी शामिल रहे, सत्ता की राजनीति के लिए हिंदू-मुस्लिम कार्ड खुल कर खेले, मंदिर आंदोलन के जवाब में लाए गए मण्डल आंदोलन ने जातीय ही नहीं, धार्मिक ध्रुवीकरण को भी खूब हवा दी. नतीज़ा यह हुआ कि नव उदारीकरण के दौर में जब भारत को सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यस्थाओं में शुमार किया जा रहा था, इण्डिया शाइनिंग और अतुल्य भारत के नारे हवा में उछल रहे थे, उसी काल में इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब भीतर ही भीतर तार-तार की जा रही थी.
सन 2012 के गुजरात विधान सभा चुनावों में जीत की तिकड़ी लगाने के बाद नरेंद्र मोदी ने भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की तरफ कदम बढ़ाए. तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा के कायाकल्प की पटकथा तैयार कर चुका था. अटल बिहारी वाजपेयी का उदार युग बीत गया और  लाल कृष्ण आडवाणी में संघ को वह आक्रामकता नहीं दिखी जो निष्क्रियता एवं भ्रष्टाचार से ग्रस्त तथा क्रमश: अलोकप्रिय हो रही यूपीए (वास्तव में कांग्रेस) सरकार को ध्वस्त करके भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सके. 2002 में गुजरात में बकौल अटल राज धर्म न निभाने वाले नरेंद्र मोदी में संघ को वह प्रचण्ड हिंदू-तेज दिख गया था. अमित शाह में उनका कुशल सारथी तैयार था ही. 2014 के लोक सभा चुनाव में संघ के हिंदुत्व-एजेण्डे का रथ मैदान में उतार दिया गया. चौतरफा विकास, नए, तेज तर्रार नेतृत्व और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के वादे ने खूबसूरत आवरण का काम किया. भाजपा प्रचण्ड बहुमत से सत्ता में आ गई.
लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान ही आने वाले समय के संकेत मिलने लगे थे. जब वरिष्ठ कन्नड़ साहित्यकार यू आर अनंतमूर्ति को पाकिस्तान चले जाने का निर्देश दिया जाने लगा था. अनंतमूर्ति का अपराध यह कि उन्होंने यह कह दिया था कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो मैं इस देश में नहीं रह पाऊंगा. गिरिराज सिंह दहाड़ रहे थे कि जो भाजपा अथवा हिंदू विरोधी हैं वे पाकिस्तान जाकर बस जाएं. बहुत सारे संघी प्रचारक, साध्वियां, भाजपा, विहिप, शिव सेना, इत्यादि के नेता विचार विरोधियों को समुद्र में डुबा रहे थे या देश निकाला दे रहे थे या देशद्रोही बता रहे थे. भाजपा की अप्रत्याशित विजय के बाद न केवल बदजुबानी बढ़ती गई, बल्कि विरोधियों पर शारीरिक हमले भी होने लगे. कन्नड़ साहित्यकार और तर्कवादी एम एम कलबुर्गी की हत्या नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल पूरा होते-होते हो गई. गिरिराज सिंह, वी के सिंह, महेश शर्मा जैसे केंद्रीय मंत्रियों, साक्षी महाराज जैसे सांसदों और प्राची जैसी विहिप की साध्वियों की जहर उगलती जिह्वा (गोहत्या करने वालों का हश्र अखलाक जैसा ही किया जाएगा) पर रोक लगाना तो दूर मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी सांसद संजीव बालियान को केंद्र में मंत्री बना दिया गया और संगीत सोम एवं सुरेश राणा को क्लीन चिट दे दी गई. खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यूपी विधान सभा उपचुनाव प्रचार में वैमनस्य और घृणा फैलाने वाले भाषण देने लगे थे और अब बिहार में ऐन चुनावों के बीच वे क्या जान-बूझ कर ही यह नहीं कर रहे कि भाजपा हारी तो पाकिस्तान में पटाखे दागे जाएंगे? यही नहीं, देश की इतिहास-संस्कृति-विज्ञान-कला-आदि संस्थाओं में ऐसे लोग बैठा दिए गए जिनका उस क्षेत्र से ज्यादा रुझान हिंदूवादी रहा है.
दादरी में जो हुआ वह साम्प्रदायिक घृणा के प्रचार ही का नतीज़ा था. मंदिर से ऐलान करके कि अखलाक के घर गोमांस खाया जाता है और फ्रिज में भी रखा है, भीड़ को उकसाया गया. अखलाक की हत्या कर दी, उसके बेटे को इतना पीटा कि बमुश्किल उसकी जान बची. अफसोस तब बढ़ने लगा जब इतनी बर्बर वारदात पर भी प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे और उनके वरिष्ठ मंत्री इसे कानून-व्यब्वस्था का मामला बता कर यूपी की सपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते रहे. राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक-साहित्यिक क्षेत्रों ने जब यह चेताया कि यह सब उस साम्प्रदायिक बयानबाजी और उकसावे का नतीज़ा है जिस पर प्रधानमंत्री समेत पूरी केंद्र सरकार चुप रहकर उसे बढ़ावा दे रही है तो आलोचकों पर हमले तेज हो गए. गोधरा (गुजरात) में नवरात्र के दौरान बैनर टांगे गए कि अपनी बेटियों को लव जिहाद से सुरक्षित रखने के लिए गरबा में मुस्लिम लड़कों को नहीं आने दें. पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम रद्द न करने पर शिव सैनिकों ने सुधीन्द्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोत दी. हाशिए पर धकेल दिए गए लाल कृष्ण आडवाणी तक ने इस काण्ड की निंदा की लेकिन देश में बढ़ रही ऐसी असहिष्णुता पर वाक‍पटु प्रधानमंत्री चुप ही रहे. राष्ट्रपति की टिप्पणी के बाद बोले भी तो क्या!
प्रधानमंत्री कतई भोले नहीं कि न जानते हों कि विज्ञान सम्मत और तार्किक बातों से अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करने वाले कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे को धमकियां क्यों दी जाती रहीं और अंतत: उनकी हत्या क्यों की गईं. ये कौन लोग हैं और किन संगठनों से सम्बद्ध हैं? देश में जगह-जगह सक्रिय हो गई सनातन संस्था और बड़ी तादाद में गोरक्षा समितियों को कहां से ताकत और संरक्षण मिल रहा है? हमलावरों और घृणा फैलाने वाले संगठनों पर कारवाई क्यों नहीं हो रही? दादरी में गोहत्या की अफवाह अखलाक की हत्या तो कराई गई लेकिन उसी इलाके में 50 साल से 800 से ज्यादा गायों को पालने-पोषने वाने हबीब भाई के योगदान का प्रचार क्यों नहीं किया गया? साम्प्रदायिकता का जहर धीरे-धीरे फैलाया जा रहा है और पिछले एक साल से यह सिलसिला तेज हुआ. फरवरी में सहारनपुर में गोहत्या के आरोप में 24 वर्षीय जहांगीर की हत्या हुई थी और पीलीभीत में हैदर अली को मोटर साइकिल में बांध कर सड़क पर घसीटा गया. बिहार के सीतामढ़ी, भागलपुर और समस्तीपुर जिलों में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया गया.
इसलिए देश भर से लेखकों-कलाकारों-इतिहासकारों-विज्ञानियों-आदि ने आवाज उठाई है कि इस देश की बहुलतावादी परम्परा को नष्ट कर इसे हिंदू राष्ट्र बनाने की साजिशों पर रोक लगनी चाहिए. यह व्यापक प्रतिरोध रंग ला रहा है और मोदी सरकार के सिपहसालार परेशान हुए हैं. बदजुबान नेताओं को बुलाकर अमित शाह ने समझाया है लेकिन सबसे ज्यादा हैरत नरेंद्र मोदी के रवैए पर है जिनकी भूमिका इस विविधता भरे देश के नहीं, भाजपा के प्रधानमंत्री की दिखती है, जैसा कि कई आलोचकों ने कहा है.
अत: मुद्दा महज कानून व्यस्था का नहीं, देश की लोकतांत्रिक, प्रगतिशील, परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व की परम्परा का है जो खतरे में दिखाई देती है और साफ संकेत हैं कि यह अभियान सत्ता-पोषित है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन, इंफोसिस के नारायणमूर्ति और किरण मजूमदार शॉ जैसी हस्तियां भी यही चिंता जाहिर करने लगी हैं. इसलिए विविध क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पहली बार उठी यह पुरजोर आवाज धैर्य से सुनी जानी चाहिए. 

(प्रतिपक्ष सम्वाद, नवम्बर, 2015 अंक)