Wednesday, August 16, 2017

सालाना हजार बच्चों की मौतों का आदी हो चुका है पूरा तंत्र


उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह की इस अमानवीय टिप्पणी के लिए ठीक ही सर्वत्र निंदा हो रही है कि अगस्त के महीने में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इन्सेफ्लाइटिस से रोजाना औसतन 20 बच्चों की मौत सामान्य बात है.
उनके बयान की राजनैतिक निर्ममता को तूल न दें तो कहना होगा कि यह भयावह सच्चाई है. गोरखपुर का प्रशासन, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ डॉक्टर, स्थानीय मीडिया, नेता और इलाके की जनता, सभी साल भर में करीब हजार बच्चों की मौत को सामान्य मानने और सहने के आदी हो चुके हैं.
इनमें प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी भी शामिल हैं, जो 1998 से लगातार गोरखपुर क्षेत्र से सांसद हैं और गाहे-ब-गाहे जापानी इन्सेफ्लाइटिस की समस्या उठाते रहे हैं. यह अलग बात है कि इसके प्रभावी समाधान या रोकथाम की दिशा में कोई खास काम नहीं हुआ.
यह भयावह सिलसिला 1977 से चला आ रहा है, जब गोरखपुर और आस-पास के इलाके में जापानी इंसेफ्लाइटिस नाम की महामारी ने पहली बार दस्तक दी थी. हर साल सैकड़ों बच्चों की मौतों और इससे ज्यादा के अपंग होने की खबरें शुरू-शुरू में मीडिया और प्रशासन में खलबली मचाती थीं. फिर धीरे-धीरे यह सालाना रूटीन बन गया. शास्न, प्रशासन और मीडिया की संवेदना कुंद होती चली गयी.
कई पत्रों और चेतावनियों के बावजूद 69 लाख रु का भुगतान न होने पर एजेंसी ने अस्पताल को ऑक्सीजन की आपूर्ति रोकी न होती तो इस साल भी गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में 10-11 अगस्त को 30 बच्चों समेत पचासेक मरीजों की मौत पर हंगामा न बरपा होता.
यह लिखते हुए हाथ कांपता है, मगर सत्य है कि, ऑक्सीजन सप्लाई बाधित होने से मौतों का सिलसिला तेज हुआ, बस. ऑक्सीजन मिलती रहती तो उन बदकिस्मत बच्चों की सांसें कुछ समय और चल जातीं. उनमें से शायद चंद बच जाते मगर ज्यादतर को मौत क्रमश: गले लगाती रहती. अपने जिगर के टुकड़ों की लाशें गोद में उठाये, चीखते-बिलखते माता-पिताओं का अस्पताल से निकलना लगातार जारी रहता, जैसे 2016 में इसी अस्पताल से एक-एक कर 514 बच्चों की लाशें उनके अभिभावक उठा ले गये थे.
अस्पताल में साल-दर-साल होती आयी मौतों का हिसाब तो लगाया जा सकता है लेकिन जो बच्चे अस्पताल नहीं पहुंच पाते या जो निजी अस्पतालों अथवा झोला छाप क्लीनिकोंमें दम तोड़ते आये, उनका कोई गणित?
इंसेफ्लाइटिस उन्मूलन अभियान के प्रमुख डॉ आर एन सिंह का आकलन है कि गोरखपुर और आस-पास के 12 जिलों में इस बीमारी से अब तक एक लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.
क्या यह आंकड़ा चौंकाने वाला है? क्या कोई चौंक रहा है? क्या कोई गम्भीरता से कुछ कर रहा है?
जुलाई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गोरखपुर में एम्सका शिलान्यास करने आये थे. तब उन्होंने अपनी ओजपूर्ण वाणी में कहा था- एक भी बच्चे को इंसेफ्लाइटिस से नहीं मरने दिया जाएगा.उस समय भी बच्चे दम तोड़ रहे थे. आज एक साल बाद जब ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की दर्दनाक मौतों से देश दहला हुआ है, गोरखपुर एम्सकी खाली जमीन पर चहारदीवारी भी पूरी नहीं बन पायी है.
अब बीते रविवार को गोरखपुर गये केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने 85 करोड़ रु की लागत से वहां क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान खोलने का ऐलान कर दिया है. साथ में मौजूद मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि जांच से पता चलेगा कि अस्पताल उपचार कर रहा था कि नरसंहार. जमीनी सच्चाई यह है कि मौजूदा  चिकित्सा तंत्र ही को सघन उपचार की जरूरत है.  
1977 से लगातार भयावह होती आयी इस माहमारी से निपटने में चिकित्सा-तंत्र और अत्यावश्यक संसाधन किस हाल में हैं, यह देखना अत्यंत ठण्डे, गैर-जिम्मेदार, अक्षम और सम्वेदनहीन तंत्र से दो-चार होना है.
बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज इंसेफ्लाइटिस के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के 12 जिलों का आधिकारिक और बिहार तथा नेपाल से आने वाले मरीजों के लिए भी विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्र है. यहां इंसेफ्लाइटिस के 2500-300 मरीज हर साल भर्ती होते हैं. क्षमता से दस गुणा अधिक. इनमें बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है.
पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट में सिर्फ 10 बिस्तर हैं. एक बिस्तर और एक वार्मर में चार-चार बच्चे रखे जाते हैं. कम से कम पचास बिस्तर के वार्ड और 300 चिकित्सा कर्मचारियों की मांग कई साल से  की जाती रही है. कोई सुनवाई नहीं.
सन 2102 और 2104 में इंसेफ्लाइटिस पर रोकथाम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम बने. टीकाकरण पर कुछ प्रगति के अलावा बाकी कार्यक्रम फाइलों में दफ्न रहे. टीकाकरण ने महामारी की विभीषिका कुछ कम जरूर की है.
गोरखपुर के अस्पताल पर मरीजों का बोझ कम हो और बीमार बच्चों को अपने ही इलाके में इलाज मिल जाए, इसके लिए यूनिसेफके मॉडल की तर्ज पर बारह वर्ष पहले बीमार नवजात शिशुओं के लिए स्थानीय स्तर विशेष केंद्रों की व्यवस्था की गयी थी. बीते शनिवार को आयी केंद्रीय टीम ने पाया कि ये केंद्र कहीं बने ही नहीं और जहां बने वहां काम नहीं करते.
गोरखपुर जिले के 68 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से सिर्फ 11 चालू पाये गये. रेफरल यूनिट सिर्फ छह और मात्र विशेष नवजात शिशु केंद्र मात्र एक है. ऐसा ही हाल आस-पास के जिलों का है.
इन हालात में पूरे पूर्वांचल के लोग इंसेफ्लाइटिस पीड़ित बच्चों को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज लाने के लिए मजबूर हैं. बिहार के पड़ोसी जिलों और नेपाल से भी मरीज यहां आते हैं. नतीजा यह कि राघवदास अस्पताल क्षमता से दस गुणा मरीजों का समुचित इलाज करने में सर्वथा असमर्थ रहता है.
पिछले तीन दशकों से किसी भी सरकार ने इस स्थिति में सुधार के बारे में गम्भीरता और ईमानदारी से प्रयत्न नहीं किये. शासन की कामचलाऊ नीति देख कर अस्पताल प्रशासन भी लापरवाह बना रहा. मौतें होती रहीं.
इसी लापरवाही का नतीजा था कि नौ अगस्त को मुख्यमंत्री के अस्पताल दौरे में न उनको और न ही वहां मौजूद संबद्ध प्रमुख सचिवों को यह बताना जरूरी समझा गया कि एजेंसी का भुगतान न होने के कारण उसने ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर देने की चेतावनी दी है.
अब यह तथ्य सामने आ चुका है कि एजेंसी ने भुगतान के लिए इस साल फरवरी से अगस्त के पहले सप्ताह तक 14 पत्र लिखे थे. कुछ पत्रों की प्रतिलिपि स्वास्थ्य महानिदेशक और प्रमुख सचिवों को भी भेजी गयी थीं.
शासन ने मुख्य सचिव के नेतृत्त्व में जो जांच बैठाई है, उसका दायरा बहुत सीमित है. मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जांच से पहले ही निष्कर्ष दे चुके हैं कि मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुईं. सरकार इस भयावह गैर-जिम्मेदारी को रूटीन बता कर टालने पर आमादा लगती है. इसीलिए आंकड़े दिये जा रहे हैं कि पिछली सरकारों में और भी ज्यादा मौतें हुईं.
असली बीमारी पकड़ने का इरादा दिखता नहीं. पूरे चिकित्सा तंत्र में जो खामियां और लापरवाहियां गहरे पैठी हुई हैं, उनको उघाड़े और दूर किये बिना पूर्वांचल में बच्चों की मौत का सिलसिला थमने वाला नहीं.  

( http://hindi.firstpost.com/india/whole-system-is-habituated-of-witnessing-yearly-death-of-thousands-of-children-47374.html) 16 जुलाई, 2017 

   


  

Friday, August 11, 2017

सिटी तमाशा तो कैसे बढ़े वैज्ञानिक नजरिया?


जब चोटी-कटवा की अफवाह से शासन-प्रशासन भी हलकान हो, शक में निर्दोष बुढ़िया मारी जा रही हो और सत्तारूढ़ राजनैतिक दल के अनुषांगिक संगठन गोबर से बंकर बनाने तथा गोमूत्र से कैंसर का इलाज करने की वकालत कर रहे हों, तब सवाल उठना लाजिम है कि हमारे जीवन में विज्ञान की जगह कितनी बची है? खेद है कि सन 2017 में भी हम अवैज्ञानिक सोच से ग्रस्त हैं. सत्तापक्ष भी वैज्ञानिक नजरिया विकसित करने एवं वैज्ञानिक संस्थानों को बढ़ावा देने का काम करने की बजाय इसके उलट आचरण कर रहा है.
ऐसे माहौल में देश के 25 से ज्यादा शहरों में विज्ञानियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में लगे लोगों ने नौ अगस्त को परिचर्चा की और सड़कों पर जुलूस निकाला. यह जानकर अत्यंत हर्ष हुआ कि लखनऊ में 93 वर्षीय विज्ञानी डॉ नित्यानंद ने जुलूस का नेतृत्त्व किया. दिल्ली, मुम्बई, कॉलकाता, पुणे जैसे बड़े महानगर तो इसमें शामिल थे ही. वैज्ञानिक नजरिये को प्रोत्साहित करने और विज्ञान संस्थानों को शोध एवं अनुसंधान के लिए पर्याप्त बजट देने की आवाज उठाने के वास्ते यह पहला महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप था.
देश का विज्ञानी समुदाय यह महसूस करता है कि सरकारें विभिन्न विज्ञान संस्थानों को शोध एवं अनुसंधान के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करातीं. अनेक संस्थानों को अपने प्रयोगों के लिए रसायन, उपकरण और अति आवश्यक सुविधाओं के लिए भी लम्बा इंतजार करना पड़ता है, नौकरशाही अड़ंगे लगाती है और जरूरी बजट नहीं दिया जाता. वर्तमान सरकार में तो विज्ञान संस्थानों की स्वायत्तता पर ही खतरा मंडराने लगा है. कई संस्थानों में अवैज्ञानिक या प्रतिगामी सोच के लोग बैठाए जा रहे हैं. आश्चर्य की बात तो यह कुछ केंद्रीय विज्ञान संस्थानों के विज्ञानियों को नौ अगस्त के विज्ञान-मार्च में शामिल न होने की हिदायत दी गयी थी.
हमारी सरकारों का यही रवैया रहा तो आम जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कैसे पनपेगा, जिसकी आज बहुत जरूरत है. याद कीजिए कि कुछ वर्ष पहले गणेश की मूर्तियों के दूध पीने की अफवाह किस कदर फैली थी. तब कई नेता, अफसर, सम्पादक तक गणेश की मूर्तियों को दूध पिलाने खड़े हो गये थे. कुछ ही दिन पहले दिवंगत, महशूर विज्ञानी प्रो यशपाल तब टीवी के पर्दे से लेकर सेमिनारों तक समझाते घूम रहे थे कि यह भौतिकी का सामान्य सिद्धांत है, कैपिलरी-प्रभाव, जिससे कोई द्रव मूर्ति की सतह पर थोड़ा फैल-जा सकता है, कि कोई मूर्ति दूध नहीं पी सकती.
दरअसल, जनता को कूप-मण्डूक बनाये रखना राजनैतिक षड्यंत्र है. कभी यहां रहस्यमय मुंह-नोचवा घूमता है, कभी चोटी-कटवा, कभी कोई महिला डायन बता कर मार डाली जाती है, कभी किसी को भूत उतारने के नाम अर अधमरा कर दिया जाता है. इसके पीछे धर्मांधता, अशिक्षा और साजिश होती है. वैज्ञानिक नजरिया ही हमें इन बेवकूफियों से बचा सकता है, जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.

अफसोस यह कि वर्तमान सता-पक्ष ही नहीं, मीडिया का बड़ा हिस्सा भी वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करने में रुचि नहीं लेता. उलटे, वह मुंह-नोचवा या चोटी-कटवा की खबरों के पीछे भागता है. नौ अगस्त के विज्ञान-मार्च की खबर मीडिया से गायब ही रही. चंद अखबारों ने छोटी-सी खबर दी, जबकि चोटी-कटवा की अफवाहों को खूब जगह मिली. लखनऊ जैसे शहर में जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के छह विज्ञान-संस्थान हैं, मीडिया की यह विज्ञान-बेरुखी अफसोसनाक है. वैज्ञानिक सोच के बिना हम जानवर ही बने रहेंगे.    
(नभाटा, 12 जुलाई, 2017)

Tuesday, August 08, 2017

धन एवं बाहु-बल का तमाशा


संसद के उच्च सदन राज्य सभा को, जैसा कि नाम ही से स्पष्ट है, भारतीय संघ के राज्यों का प्रतिनिधि सदन है. राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित जन-प्रतिनिधि अपने राज्य का प्रतिनिधि चुनकर उच्च सदन में भेजते हैं. चूंकि यह प्रतिनिधि दलीय से ज्यादा राज्य का माना जाता है इसलिए विधायकों को पार्टी-व्हिप से बांधने की बजाय अपने विवेक या अंतरात्मा की आवाजसे वोट डालने की छूट दी गयी. यही छूट कालांतर में राज्य सभा चुनाव में विधायकों की खरीद-फरोख्त की आड़ बन गयी.

उच्च सदन की गरिमा और विधायक-मतदाताओं के कारण  राज्य सभा चुनाव को लोकतंत्र के लिए आदर्श एवं गरिमामय होना चाहिए था लेकिन होता इसके ठीक उलट है. आम मतदाता की तुलना में हमारे विधायक-मतदाता कहीं ज्यादा बिकाऊसाबित होते हैं. वर्ना भाजपा तीसरा प्रत्याशी जिताने के लिए कांग्रेसी विधायकों की ऊंची बोली क्यों लगाती और कांग्रेस को अपने विधायकों को रेवड़ की तरह हाँक कर कर्नाटक में क्यों कैद करना पड़ता. धन-बल के साथ बाहु-बल भी चल पड़ा.

पंचायत से लेकर संसद तक का हर चुनाव येन-केन-प्रकारेण जीतने में जुटे भाजपा के रणनीतिकारों ने गुजरात में जो किया वह राज्य सभा चुनाव में नैतिकता और गरिमा जैसे शब्दों को जोर का एक धक्का और दे गया लेकिन कतई नया नहीं था. जून 2016 में राज्य सभा की 57 सीटों के लिए जिन नौ राज्यों में चुनाव हुआ था, उसमें कम से कम छह राज्यों की 30 सीटों पर धन-बल का बोलबाला रहा था. कांग्रेस और भाजपा में खूब आरोप-प्रत्यारोप लगे थे. एक समाचार चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में कर्नाटक में जनता दल के विधायक अपने वोट के लिए धन की मांग करते दिखाये गये थे. उत्तर प्रदेश में प्रीति महापात्र, राजस्थान में कमल मोरारका, और झारखण्ड में महेश पोद्दार पर विधायकों को खरीदने के आरोप लगे थे. क्रॉस वोटिंग भी खूब हुई थी.

सन 2000 के राज्य सभा चुनाव को इस संदर्भ में याद करना ज्यादा मौजूं होगा. तब विधायकों की खरीद-फरोख्त और क्रॉस वोटिंग का कीर्तिमान-जैसा बना था. भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के विधायकों ने बड़े पैमाने पर दूसरे प्रत्याशियों को वोट दिये. सबसे आश्चर्यजनक नतीजा उत्तर प्रदेश में आया. वहां लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी राजीव शुक्ला को प्रथम वरीयता के पचास वोट मिले. पार्टी के विधायकों की संख्या के हिसाब से यह बहुत ज्यादा था.वह काफी चर्चित और सनसनीखेज चुनाव था. एक हफ्ते तक यह अखबारी सुर्खियों में रहा कि देश के एक बड़े उद्योग घराने के एजेण्ट नकदी की अटैचियां लेकर लखनऊ के होटलों में ठहरे हैं. सभी दलों के विधायकों की ऊंची बोली लगी थी. भाजपा ही के 20 विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने की खबर केंद्रीय नेतृत्व के पास पहुंची थी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और तब पार्टी प्रवक्ता वैंकैया नायडू ने राज्य सभा चुनाव में धन-बल के प्रभाव में क्रॉस वोटिंग को गम्भीर मामला बताते हुए इसकी निंदा की थी. आडवाणी जी ने चुनाव प्रक्रिया में बदलाव का सुझाव दिया था, जिसका कांग्रेस नेताओं ने भी स्वागत किया था. खुद कांग्रेस के विधायकों ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को जिताने के लिए क्रॉस वोटिंग की थी. तब तक राज्य सभा चुनाव में भी मतदान गोपनीय होता था. उसी के बाद लोक प्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करके राज्य सभा चुनाव में खुले मतदान की व्यवस्था की गयी. अब विधायकों को अपनी पार्टी के एजेण्ट को दिखा कर वोट देना होता है. इसके बावजूद विधायक क्रॉस वोटिंग करते हैं.

खुले मतदान से इतना ही हुआ कि क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों की पहचान आसान हो गयी. पहले यह तो पता चल जाता था कि क्रॉस वोटिंग हुई है लेकिन किस-किस ने की है, इस पर कयास ही लगाये जाते थे. इस संशोधन को जब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी तो अदालत ने खुले मतदान की व्यवस्था को बरकरार रखते हुए टिप्पणी की थी कि यदि गोपनीयता भ्रष्टाचार का स्रोत बन रही है तो रोशनी और पारदर्शिता में उसे दूर करने की क्षमता है.हमारे माननीय विधायकों ने पारदर्शिता की इस क्षमता को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं रखी.

खुले मतदान के बावजूद विधायकों की क्रॉस वोटिंग का मुख्य कारण यह है कि राज्य सभा चुनाव में विधायकों पर पार्टी-ह्विप लागू नहीं होता. क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक दल-बदल कानून से बचे रहते हैं यानी उनकी विधान सभा सदस्यता नहीं जा सकती. राजनैतिक दल अपने विधायकों को निर्देश ही दे सकते हैं, जिसके उल्लंघन को अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें पार्टी से निलंबित किया जा सकता है. उनकी विधान सभा सदस्यता बची रहती है.

एक और बड़ा कारण यह है कि राज्य सभा चुनाव में विधायकों के पास वरीयता–क्रम में एकाधिक मत होते हैं. प्रथम वरीयता मत अपनी पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को देने के बाद वे दूसरी-तीसरी वरीयता के मत दूसरे प्रत्याशी को बेच देते हैं. बोली ऊंची हो तो प्रथम वरीयता मतों का भी सौदा होता है. कुल मिला कर राज्य सभा चुनाव में धन-बल का खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल होता आ रहा है. जैसे-जैसे धंधेबाज एवं आपराधिक चरित्र के विधायक चुन कर आते गये, वैसे-वैसे  चुनाव में धन-बल का प्रभाव बढ़ता गया. समय-समय पर विभिन्न उद्योगपतियों ने भी थैलियों से विधायकों की अंतरात्मा खरीद कर राज्य सभा का रास्ता पकड़ा.   

राज्य सभा की उपयोगिता के बारे में भी अक्सर सवाल उठते रहते हैं. हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस उच्च सदन ने अनेक बार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. 1919 के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (गवर्नमेण्ट ऑफ इण्डिया एक्ट)  में पहली बार ब्रिटेन की तरह भारत के लिए दो सदनों वाली संसदीय व्यवस्था की गयी थी. आजादी के बाद हमारी संविधान सभा ने इस पर विस्तार से चर्चा की और पाया कि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में राज्यों का सदन होना जरूरी है. हमारी संघीय और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जनता द्वारा सीधे निर्वाचित लोक सभा ही पर्याप्त नहीं मानी गयी.

कालांतर में कई अवसरों पर यह सत्य प्रमाणित हुआ. लोक सभा में सत्ता पक्ष के अपार बहुमत की स्थिति में राज्य सभा ने रचनात्मक प्रतिरोध की लोकतांत्रिकआवश्यकता पूरी की है. वर्तमान मोदी शासन तो इसका उदाहरण है ही. 1977-79 के दौरान जनता पार्टी के राज में, 1999-2004 में राजग-शासन और  2009-14 में यूपीए के दूसरे कार्यकाल में राज्य सभा ने कई मौकों पर प्रतिरोध के आवश्यक मंच की भूमिका अदा की. यह भी सच है कि कई बार सत्ता पक्ष राज्य सभा में बहुमत न होने के कारण कुछ जरूरी विधेयक आदि पारित नहीं करा पाता, जैसा कि वर्तमान सरकार के साथ हुआ है. भाजपा इसलिए भी राज्य सभा में जल्द से जल्द बहुमत पाने के लिए बेताब है. विपक्ष की धार कुंद करने की मंशा के अलावा इस बेताबी ने भी राज्य सभा चुनाव को बड़ा तमाशा बना दिया.  
 (प्रभात खबर, 08 अगस्त, 2017)
  

सोच को स्वाइन


पीजीआई, मेडिकल कॉलेज और दूसरे बड़े सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में स्वाइन-फ्लू के लक्षणों वाले मरीज अन्य रोगियों-तीमारदारों की भीड़ में जिस तरह घूम रहे हैं, उसे देखते हुए अचम्भा नहीं होना चाहिए कि यह खतरनाक रोग ऐन राजधानी में सबसे ज्यादा फैल रहा है. पीजीआई और मेडिकल कॉलेज का प्रशासन ऐसे मरीजों को भीड़ से अलग करने या कम से कम मास्क लगाने की हिदायत देने की भी चिंता न करे तो क्या कहा जाए? जनता का एक वर्ग इतना सचेत नहीं है, मगर इन संस्थानों के कर्ता-धर्ता ? स्वाइन-फ्लू के मरीज अस्पतालों की भीड़ में संक्रमण फैला रहे हैं. डॉक्टर और अस्पताल कर्मचारी सबसे ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं, यह तथ्य भी प्रशासन को चौंकाता नहीं. आइसोलेशन वार्ड बनाकर क्या होगा, जब ओपीडी से ही रोग फैल रहा हो? सरकार और प्रशासन बचाव के सुझाव देते विज्ञापन देकर जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, उन सुझावों पर स्वयं अमल नहीं करते.
बिजली विभाग जिस तरह ट्रांसफॉर्मर लगाता है और जो उसके सुरक्षा मानक हैं, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है. वे कहीं भी सड़क किनारे, फुटपाथ पर, किसी पार्क के कोने में यूं ही रखे देखे जा सकते हैं. अक्सर उनसे दुर्घटनाएं होती हैं. ट्रांसफॉर्मर छोड़िए, जिस तरह बिजली कर्मचारी बिना पर्याप्त उपकरणों के लाइन पर काम करते हैं, वह बेहद गैर-जिम्मेदाराना है. बिजली कर्मचारियों (आम तौर पर दिहाड़ी वाले) की करण्ट से और सफाई कर्मचारियों की सीवर की जहरीली गैस से होने वाली मौतें बहुत पुराना सिलसिला हैं. आज तक उनकी सुरक्षा के सामान्य उपाय भी किसी सरकार, बिजली विभाग और नगर निगम के जिम्मेदारों ने नहीं किये. हर मौत के बाद गुस्सा फूटने पर कुछ अश्वासन और थोड़ा मुआवजा, बस. असल में यह लापरवाही आपराधिक है. ऊपर से नीचे तक सबको पता है कि यह जानलेवा काम है और चंद सुरक्षा उपाय जिंदगी बचाएंगे, तब भी कोई हलचल नहीं होती.
खुले मैनहोल, सड़कों के गड्ढे और रोड डिवाइडर जरा-सी दुर्घटना में जानलेवा साबित होते हैं. गड्ढों और मैनहोल में से झांकती टहनियां, जो किसी जागरूक नागरिक का काम होता है, आपको सावधान कर दें तो ठीक वर्ना तो बीच सड़कों पर मौत का सामान सजा ही है. रोड-डिवाइडर सरिया-कंक्रीट से इतने मजबूत बनाये जाते हैं जैसे कि बांध की दीवार हो. कोई उनसे टकराया तो मरेगा या हाथ-पैर तो तुड़वा ही बैठेगा. एक पुराने इंजीनियर बता रहे थे कि रोड-डिवाइडर मामूली गारे से बनाये जाने चाहिए ताकि कोई टकराये तो डिवाडर टूटे, मनुष्य और उसके वाहन की दुर्गति न हो. मगर यहां चिंता यह है कि मनुष्य मर जाए तो कोई बात नहीं, डिवाडर सुरक्षित रहना चाहिए.
गैर-जिम्मेदारियां हममें किस कदर भर गयी हैं, सोच कर ही सिहरन होती है. बिजली की हाई-टेंशन लाइन के ठीक नीचे तक अपने मकान का छज्जा बढ़ाते वक्त यह ख्याल तो आता ही होगा कि यह कितना खतरनाक है. एक दिन अचानक वही लाइन घर के एक युवक की जान ले लेती है. गुस्साई जनता बिजली विभाग के खिलाफ नारे लगाते हुए सड़क जाम करती है. जिला प्रशासन मुआवजा देकर मामला शांत कराता है. सब मान लेते हैं कि हादसा था और हादसे होते रहते हैं!
इलाज के लिए अस्पताल जाइए और खतरनाक बीमारी लेकर घर लौटिए. जान बचाने के लिए खून चढ़वाइए और जानलेवा हेपटाइटिस-बी या सी से संक्रमित हो जाइए, यह हमारे यहां कितना आम हो गया है. जन-स्वास्थ्य के प्रति ऐसी घोर लापरवाही आपराधिक तथा अक्षम्य होनी चाहिए. अफसोस कि कहीं कोई हलचल नहीं.  (नभाटा, 5 अगस्त, 2017)  



Wednesday, August 02, 2017

विद्यार्थियों को ‘हिंदुत्व’ और ‘संघी’ सामान्य-ज्ञान रटा रही भाजपा


अमित शाह द्वारा यूपी में जारी पुस्तिका में नेहरू-गांधी का नाम  नहीं
नवीन जोशी
महाराजा सुहैल देव ने किस मुस्लिम आक्रांता को गाजर-मूली की तरह काट दिया था?
अदालत में तलब किया जाकर सजा पाने वाला देश का पहला प्रधानमंत्री कौन था?’
उत्तर प्रदेश के हजारों स्कूलों के विद्यार्थी आजकल एक सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता के लिए ऐसे ही कुछ सवाल-जवाब रट रहे हैं. यह प्रतियोगिता भारतीय जनता पार्टी दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शती के अवसर पर 26 अगस्त को प्रदेश के विभिन्न केंद्रों पर करा रही है. सामान्य-ज्ञान का पाठ्यक्रम भी भाजपा ही ने तैयार किया है. इसके लिए तैयार एक पुस्तिका का लोकार्पण भाजपा अध्यक्ष ने अपनी लखनऊ यात्रा में बीते सोमवार को किया.
नये राष्ट्रपति के पहले भाषण में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का नामोल्लेख न होने और दीनदयाल उपाध्याय को महात्मा गांधी के बराबर स्थान दिये जाने से खफा कांग्रेस चाहे तो अब आगबबूला हो सकती है. भाजपा ने इसका पूरा इंतजाम कर दिया है.
नयी पीढ़ी को इन दिनों जो सामान्य ज्ञान उत्तर प्रदेश में रटाया जा रहा है उसमें नेहरू और महात्मा गांधी का कोई जिक्र नहीं है. विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़े नेताओं की प्रशस्ति पढ़ायी जा रही है. इनमें वीर सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नानाजी देशमुख जैसे नेता शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली और लोकप्रिय नेताओं में शुमार किया गया है.
सत्तर पृष्ठों की सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता पुस्तिका उत्तर प्रदेश के हजारों स्कूलों में बांटी जा रही है, जिसे कंठस्थ करके विद्यार्थियों को प्रतियोगिता में भाग लेना है. प्रश्न-पत्र इस पुस्तिका में बताये गये सामान्य-ज्ञान पाठों के आधार पर ऑब्जेक्टिव सवालों के रूप में होगा. छात्र-छात्राओं को डेढ़ घण्टे में एक सौ सवालों के जवाब ओएमआरशीट पर देने होंगे.
प्रतियोगिता का परिणाम शिक्षक दिवस यानी पांच सितम्बर को जारी होगा. हर जिले में प्रथम दस स्थान पाने वाले छात्रों को 25 सितम्बर को दीनदयाल उपाध्याय के जन्म दिवस पर पदक और प्रमाणपत्र से सम्मानित किया जाएगा. साठ फीसदी से ऊपर अंक पाने वाले विद्यार्थी भी प्रमाणपत्र पाएंगे.
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के सचिव सुभाष यदुवंश के हवाले से इण्डियन एक्सप्रेसमें बुधवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य ज्ञान प्रतियोगितानाम की इस पुस्तिका की अब तक सात लाख प्रतियां छप चुकी हैं और नौ हजार स्कूल नौवीं-दसवीं के अपने छात्रों को इस प्रतियोगिता-परीक्षा में शामिल कराने की सहमति दे चुके हैं.
पुस्तिका में जनसंघ, भाजपा और संघ के प्रमुख नेताओं के अलावा राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आदि के बारे में बताया गया है. दीनदयाल उपाध्याय की संक्षिप्त जीवनी और आरएसएस एवं जनसंघ के लिए उनके योगदान का परिचय है. भाजपा के नये दलित प्रेम को देखते हुए इसमें बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के बारे में भी जानकारी दी गयी है. स्वामी विवेकानंद, गुरु गोविंद सिंह, बिरसा मुण्डा और रानी लक्ष्मी बाई को भी शामिल किया गया है.
भाजपा की सामान्य-ज्ञान पुस्तिका नयी पीढ़ी को देश के पहले गवर्नर-जनरल, पहले राष्ट्रपति, पहले उप-राष्ट्रपति, पहले लोक सभा अध्यक्ष, पहले उप-प्रधानमंत्री, पहले विधि मंत्री, पहली महिला मुख्यमंत्री और पहली महिला राज्यपाल के बारे में तो बताती है लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री के बारे में जानकारी देना जरूरी नहीं समझती. महात्मा गांधी पर भी पुस्तिका मौन ही है. अटलबिहारी वाजपेयी और उनकी सबसे बड़ी गठबंधन सरकार के बारे में बताना नहीं भूला गया है.
इंदिरा गांधी का जिक्र इस सवाल के सही उत्तर के रूप में है कि दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के समय देश का प्रधानमंत्री कौन था? इसी तरह नरसिंह राव का नाम इस प्रश्न के सही उत्तर में है कि अदालत में तलब होकर सजा पाने वाला देश का पहला प्रधानमंत्री कौन था? महाराजा सुहैल देव की बहादुरी का उल्लेख करते हुए जो सवाल पुस्तिका में है, उसकी शब्दावली गौर करने लायक है- महाराजा सुहैल देव ने किस मुस्लिम आक्रांता को गाजर-मूली की तरह काट दिया था 
केंद्र की नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी सरकारों की योजनाओं को भी सामान्य-ज्ञान में शामिल किया गया है. योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग बनाना, मोदी सरकार की मेक इन इण्डियाअभियान, हजार-पांच सौ के पुराने नोटों की बंदी, आदि की जानकारी सवाल-जवाब के रूप में दी गयी है. सेना के लिए एक रैंक-एक पेंशन’, सीमा पार की गयी सर्जिकल स्ट्राइक, मुम्बई से अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन और आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री की मन की बातभी इस सामान्य-ज्ञान में शामिल है.  
भाजपा की सामान्य-ज्ञान परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने के लिए नई पीढ़ी को रटना होगा कि मोदी सरकार की जन-धन योजना में 29.50 करोड़ बैंक खाते खोले गये और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में 18,452 गांवों को बिजली दी जा रही है.
चूंकि अभी यह सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता उत्तर प्रदेश में हो रही है, इसलिए प्रदेश की योगी सरकार की योजनाओं-कार्यक्रमों, जैसे एण्टी-रोमियो दस्ते, किसानों की कर्ज माफी, आगरा और गोरखपुर हवाई अड्डों के नये नामकरण और कैलाश-मानसरोवर यात्रियों को एक लाख रु की सहायता, के बारे में बताया गया है.
भाजपा की यह सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता जाहिर है कि उसके उग्र हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और कांग्रेस-मुक्त भारत के एजेण्डे का हिस्सा है. नई पीढ़ी को  इस देश की बहुलतावादी परम्परा और गांधी-नेहरू के योगदान की हवा नहीं लगने देना है.
देखना है कि बची-खुची कांग्रेस इस आक्रमण का मुकाबला कैसे करती है.

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